Sunday, 2 April 2017

ना तुमने चाहा ना मैंने चाहा

दुख है कितना अपना
कितना पराया 
जब अपने ही हुए पराये 
तुम जानो या मैं जानूँ 
क्योंकि दुख ये 
तुमसे चिपटा या मुझसे चिपटा ।।
दुख है कितना तीखा 
कितना घातक
जब सहलाते हाथ बींध गए 
तुम जानो या मैं जानूँ
क्योंकि दुख ने 
तुमको बींधा या मुझको बींधा ॥
दुख है कितना उजला 
कितना मैला 
जब विश्वासों से धोखा पाए
तुम जानो या मैं जानूँ 
क्योंकि दुख ये 
तुम पर छाया या मुझ पर छाया ।।
दुख है कितना भारी 
कितना भरकम 
तुम जानो या मैं जानूँ 
जब भरी दुपहरी रात हुई
क्योंकि दुख ये 
तुम पर बरसा या मुझ पर बरसा ।।
दुख होगा कब मोम सरीखा 
या होगा कब पानी सा 
आज जरूरत एका की है 
तुम कहते हो या मैं कहता हूँ 
क्योंकि दुख को 
ना तुमने चाहा ना मैंने चाहा ।। 

-
त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद ।


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