Sunday, 2 April 2017

संवेदना तो मर गयी है

एक आंसू गिर गया था , एक घायल की तरह .
तुम को दुखी होना नहीं , एक अपने की तरह .
आँख का मेरा खटकना , पहले भी होता रहा .
तेरा बदलना चुभ रहा , महीन रेत की तरह .
गर्म नारों से बदलना , चाहते थे हम सभी को ,
अब हवा में उड़ रहे हो , शुष्क पत्ते की तरह .
मेरी कमीजों पर कभी , तुम गुलाब से थे सजे .
अब हो गए भाव वाले , तुच्छ कागज की तरह .
दुःख नहीं है इस बात का , पास मेरे आते नहीं
खून तेरा क्यों हो गया है , खार पानी की तरह .
लोग अब भी आश्वस्त हैं , राहतें ले आयेगा ही.
वे आसमान में ताकते हैं , भक्त लोगों की तरह .
अब मुझे मालूम है कि , दिल तेरा सुनता कहाँ .
संवेदना तो मर गयी है , व्यर्थ उपमा की तरह.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

दाएं से बाएं

बल खा कर वे निकल गए हैं
दाएं से बाएं।
मानो निकला अभी अजूबा
दाएं से बाएं।।
कुछ नादान चिल्लाते आए
दाएं से बाएं।
एक सुनहरा अवसर खोया
दाएं से बाएं।।
हो हल्ले में भीड़ बढ़ गई
दाएं से बाएं।
अंधों के हाथ लगी बटेरें
दाएं से बाएं।।
सब पूछ रहे मकसद अपना
दाएं से बाएं।।
गगन ताकते गिरे कूप में
दाएं से बाएं।।
भीगी पानी पीकर ईंटें
दाएं से बाएं।
अब दीवार में लगती ईंटें
दाएं से बाएं।।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

दिये गये गुलाब

दिये गये गुलाब
किताबों के मध्य
पन्नों पर सूख गए हैं
परंतु अभी तक
ज्यों की त्यों जिंदा है 
तुम्हारे मिलने की स्मृतियाँ,
तुम संशय न करो
तुम्हारी यादों का तुलसीवन
हर बरसात के साथ
हो जाता है सघन से सघनतम।
सूखे गुलाब को जब भी
छूती है तर्जनी
वह हो जाती है व्यस्त
हाँ, यह वही तर्जनी है
जो तुम्हारे कपोल पर
लुढ़कते आँसुओं को
उठा लेती थी मोतियों की तरह।
अब परिदृश्य बदल गए हैं
तर्जनी वही है
परंतु आँसू भी उसी के हैं
अब वह उन्हें मोतियों की तरह
नहीं उठाती है
बल्कि छिटक देती है
मौसम को कुछ नम करने के लिए।
दबे गुलाब सुर्ख नहीं है
परंतु सौरभ अभी भी मौजूद है
किताबें और तर्जनी
सूखे गुलाबों से आज भी महकती है
आखिर यह ताकत
उस प्रेम की है
जिसे अनुभव ही किया जा सकता
रस के होने या न होने की तरह।
मुझे अब पत्थरों से
नहीं रही शिकायत
क्योंकि गुलाब की उत्पत्ति
उनके विरुद्ध की गई
प्रकृति की है कोमल प्रतिक्रिया।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

सत्ता की भूख नहीं लगती

शहर के तमाम रास्ते
बंद कर दिए हैं
घर पहुंचने के लिए
जहाँ गली के नुक्कड़ पर
कर रहे होंगे प्रतीक्षा 
धूल सने चिथडों में
लिपटे मेरे मित्र।
कौन अपना कौन पराया?
सब लगे हैं इसी जुगत में
साथ वाले को
कैसे चटाई जा सकती है धूल
कैसे चढ़ा जा सकता है
उसकी पीठ और कंधे पर
किसे पड़ी है कि
वह चिंता करे
मेरे या तेरे बारे में
सुबह के निकले
घर पहुंचेंगे भी या नहीं.....
बेचारे विवश हैं सत्ता के पीछे।
मेरे मित्रों को नुक्कड़ पर देख
कहीं चली जाएगी
मेरी थकान भूख-प्यास
छाँव की तरह
पीछा करने वाला डर
गीदड़ की तरह
भाग कर कहीं छिप जाएगा
मैं कम से कम अपने घर तक
जाने वाले रास्ते पर
तब तक सुरक्षित हूँ
जब तक चिथडों में
व्याकुल मित्रों को
सत्ता की भूख नहीं लगती।
.- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

ना तुमने चाहा ना मैंने चाहा

दुख है कितना अपना
कितना पराया 
जब अपने ही हुए पराये 
तुम जानो या मैं जानूँ 
क्योंकि दुख ये 
तुमसे चिपटा या मुझसे चिपटा ।।
दुख है कितना तीखा 
कितना घातक
जब सहलाते हाथ बींध गए 
तुम जानो या मैं जानूँ
क्योंकि दुख ने 
तुमको बींधा या मुझको बींधा ॥
दुख है कितना उजला 
कितना मैला 
जब विश्वासों से धोखा पाए
तुम जानो या मैं जानूँ 
क्योंकि दुख ये 
तुम पर छाया या मुझ पर छाया ।।
दुख है कितना भारी 
कितना भरकम 
तुम जानो या मैं जानूँ 
जब भरी दुपहरी रात हुई
क्योंकि दुख ये 
तुम पर बरसा या मुझ पर बरसा ।।
दुख होगा कब मोम सरीखा 
या होगा कब पानी सा 
आज जरूरत एका की है 
तुम कहते हो या मैं कहता हूँ 
क्योंकि दुख को 
ना तुमने चाहा ना मैंने चाहा ।। 

-
त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद ।


जहाँ पर कटेगा आदमी

हो रहे हैं आयोजन 
जिसमें जुटाए जा रहे हैं लोग 
जहाँ लोग सुनना चाहते हैं 
कुछ राहत भरी घोषणाएँ 
जिससे मिले एक क्षण 
मुस्कराने के लिए 
परंतु उछाली जाती है स्याही 
जैसे मंचित नाटक की 
कथावस्तु में 
प्रसंग बदलने के संकेत में 
कर दी गई हो आकाशवाणी।
आयोजन में बदल जाते हैं दृश्य 
मंच पर मच जाती है भगदड़ 
सुरक्षा में लगे लोग 
तुरंत तोलते हैं भुजाओं का बल, 
गर्दने दबोचने में 
असंतुष्ट जन को घिसटने में
दिखाते हैं कौशल ,
इधर असंतुष्ट जन हर हाल में 
प्रकट करते हैं असंतोष 
उधर मुख्य वक्ता चीखता है -
मेरी आवाज दबाई जा नहीं सकती।
जमा हुए लोग 
नहीं समझ पाते हैं 
आखिर माजरा है क्या? 
वे व्याकुल हैं बहुत कुछ जानने को
परिस्थितियाँ बदल गई कुछ यों 
मानो छा गया कोहरा 
धवल दिवस के वक्ष पर
जिससे दृष्टि हो गई विकल 
वर्तमान के दृश्य देखने को।
स्याही के उछलने पर 
वह सब हो गया है गौण 
जो आयोजन में आगमन का 
मुख्य रहा था प्रयोजन 
अब स्याही ही हो गई है मुख्य 
जिसके आधार पर होगी बहस 
खड़े होंगे नये मुद्दे 
बनेगी नई रणनीतियां 
रचे जाएँगे समर 
योद्धा बनेंगे स्याह चेहरे 
जहाँ पर कटेगा आदमी।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

स्नेह की बरसात

बैठ कर समाधि पर
रोने से अच्छा था,
जब थे तब ही 
मिल लेते गले, 
अपनेपन के
पुष्प लिए,
तब तुम्हारी आँखों में 
पछतावे के स्थान पर 
स्नेह की 
बरसात होती।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

प्रेम की मुक्तावस्था

बांधने की कोशिश में 
भूल ही जाते हो कि 
बांधने वाली मूंज की 
खुरदरी रस्सी 
प्रथम तो बाँधने वाले के 
लिपटती है हाथों से 
अौर अंत में छोड़ जाती है 
निशान क्रूरता के।
तमाम बंधनों की 
सफलता पर
अपनी विजय तय करने वाले 
सुकोमल तंतुओं के आकर्षण को
पहचान लिया होता 
जहाँ समर्पण के विनय में 
जय - पराजय नहीं रखते अस्तित्व
जहाँ बंधन के स्थान पर 
संबंध साँस लेते हैं।
देह के कसे क्रूर बंधन 
कब रोक पाए 
प्रेम की मुक्तावस्था को 
जहाँ पर आत्मा 
खुली आँखों के समक्ष 
अपने प्रियतम से 
दिवस भर में 
हजार अभिसार करती है।
तृप्ति मिलती है बंधनों में 
तो कर ही लीजिए पूर्ण 
मन की इच्छाएं 
जो विवश करती है दमन के लिए 
परंतु तरल आत्मा फिर भी 
बंधनों के पार जाएगी
अभिसारण करने के लिए 
जैसे रिसकर चली जाती है रोशनी 
अंधेरी कोठरी के 
महीन छिद्र से बाहर
यह चुनौती कमतर नहीं है 
क्रूर बंधनों तुम्हारे लिए ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।