Thursday, 7 January 2016

तब तक हूँ सुरक्षित

शहर के तमाम रास्ते 
बंद कर दिए हैं 
घर पहुंचने के लिए 
जहाँ गली के नुक्कड़ पर
कर रहे होंगे प्रतीक्षा 
धूल सने चिथडों में 
लिपटे मेरे मित्र।
कौन अपना कौन पराया? 
सब लगे हैं इसी जुगत में 
साथ वाले को 
कैसे चटाई जा सकती है धूल 
कैसे चढ़ा जा सकता है 
उसकी पीठ और कंधे पर 
किसे पड़ी है कि
वह चिंता करे 
मेरे या तेरे बारे में 
सुबह के निकले 
घर पहुंचेंगे भी या नहीं..... 
बेचारे विवश हैं सत्ता के पीछे।
मेरे मित्रों को नुक्कड़ पर देख
कहीं चली जाएगी 
मेरी थकान भूख-प्यास 
छाँव की तरह 
पीछा करने वाला डर 
गीदड़ की तरह 
भाग कर कहीं छिप जाएगा 
मैं कम से कम अपने घर तक 
जाने वाले रास्ते पर 
तब तक  हूँ सुरक्षित 
जब तक चिथडों में 
व्याकुल मित्रों को 
सत्ता की भूख नहीं लगती।
.- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।


सब का स्वागत

नये वर्ष में प्यारे मित्रों 
सब का स्वागत। 
खुशियों के हर क्षण का अपने 
घर में स्वागत।।
धवल कीर्ति की विमल पताका 
आना-आना घर-घर आना। 
नवल सृजन की सरस फसल को 
लाना-लाना आँगन लाना।
स्वागत-स्वागत नये वर्ष में 
यश का स्वागत। 
खुशियों के हर क्षण का अपने 
घर में स्वागत।।
उत्साहित आनन से कर्मन 
गढ़ते हुए बढ़ बढ़ जाएँ। 
मन प्रफुल्लित से फलश्रुति को 
रचते हुए मढ़- मढ़ जाएँ।
सरल पथों सह विरल पथों पे 
ऊर्जा का स्वागत। 
खुशियों के हर क्षण का अपने 
घर में स्वागत।।
भोर उजाला लेकर आए 
संध्या लाए घर-घर खुशियाँ। 
अगल-बगल सब गायन गाए 
उत्सव की रहे रंग रलियाँ।
रोग-शोक से दूर रहें सब 
मित्रों का स्वागत। 
खुशियों के हर क्षण का अपने 
घर में स्वागत।।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।


तलाश में हूँ

जिंदा हूँ या मरा हुआ 
तुम ही अच्छे से बता सकते हो 
मैं तलाश में हूँ उनकी 
जिनके बिना जिंदगी सम्भव नहीं।
कहने को सब है 
नहीं है तो वे ही नहीं है 
वे नहीं तो फिर कुछ भी नहीं 
इसी कारण नित्य मारा जाता हूँ।
उन्हें पाने के पागलपन में 
कई अमीर फकीर हुए हैं 
कई सूली पर चढ़ा दिए गए हैं 
यह रास्ता आग से दहकता है।
वे रईस हैं और महल में हैं 
मैं गुमनाम रास्तों पर सफर पर हूँ 
चलकर भी उनके पास पहुंचना है 
मरकर भी उनके पास पहुंचना है।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

हमारी लड़ाई

सुनाई देती है
हर क्षण आहट
जैसे वे आ रहे हैं
पास..... पास और बिल्कुल पास
टटोलते हैं माहोल को 
तब होता है वायवी अनुभव
यही समय होता है
अभिव्यक्तिै के लिए खतरा
क्या कहें -
वे हैं या वे नहीं है?
मानो यह समय
बर्फ जमी ऊँची पहाड़ी के
शीर्ष पर पहुंचने का है
जहाँ ठहराव में भी
और उतराव में भी
हमारे जीवन के लिए
भरी हुई है चुनौतियाँ।
वे नहीं मिलते हैं
लाख कोशिशों के बाद भी
जबकि कहती है आहट
वे हैं आसपास ही
उम्मीद है कि
अब भी वे मिलेंगे
यह वैसी ही है उम्मीद
मानो जीर्ण-शीर्ण होकर
बंद पड़े थिएटर के सम्मुख
कोई थिएटर प्रेमी
आज भी फड़फड़ाते पोस्टर का
करता है इंतजार
अब सवाल यह है कि
उन्हें कोई समझाएगा
या हमें कोई समझाने का
उठाएगा बीड़ा ।
यह विचित्र लोगों का है देश
जहाँ प्रेम पर
होते हैं अलसुबह प्रवचन
लोग प्रवचन के साथ-साथ
करते हैं उसके निर्वहन का प्रण
लेकिन दिन के बढ़ने के साथ
आ जाते हैं वे आदिम अवस्था में
प्रिय की आहट और अस्तित्व
खो जाते हैं आदिम प्रवृत्तियों में
मानो भूचालन से मलबे के ढेर में
बच्चे के रंगीन खिलौने कहीं
दब से गए हैं
अंत तक रहेगी निरंतर हमारी लड़ाई
आदिम प्रवृत्तियों के विरुद्ध
प्रेम की विशुद्ध प्रतिष्ठा के लिए।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

केंचुए से लोग

भूख और प्यास के समक्ष 
झुक जाते हैं लोग 
लेकिन खड़े हो जाते हैं 
स्वत्व और अस्मिता के
सवाल के आगे 
मामूली से गिने जाने वाले 
केंचुए से लोग 
तमककर उछल आते है 
तब सिंहों की तरह 
या,
दबाए गए फणींद्र की तरह
उस समय बचाव के अतिरिक्त 
कुछ भी नहीं रहता शेष 
दमन और दलन के पास
इतिहास बदलते हैं 
वे ही केंचुए से लोग ।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

मुक्ति के लिए

मुक्ति का अर्थ है मुक्ति में
हम भटकते हैं मुक्ति के लिए 
दीवारें और दीवारें 
पत्थर और पत्थर 
शून्य और शून्य .......
ये सब आते हैं जिंदगी में 
मुक्ति के अभाव में 
जैसे जीवन हो जाता है विवश 
दृष्टि के अभाव में 
रतजगे जैसी परंपरा के नाम पर।
मुक्ति के अर्थ को 
वे कैसे जान सकते 
जो अक्सर पंख बांधने के 
हूनर को तराशते रहते 
जैसे बहेलिया पक्षी को
फाँसने का हूनर 
नित्य ही तराशता रहता 
मानो यही है उसकी जिंदगी का सत्य।
बहेलिया छू नहीं सकता गगन 
उसमें उड़ान भरने का होंसला नहीं 
बहेलिया ऊंचाई भी नाप नहीं सकता 
उससे स्वप्न नहीं देखा जा सकता 
बहेलिया गा नहीं सकता 
वह प्रेम से परिचित ही नहीं 
वह कैद है स्वयं में 
अतः अपनी निजता के लिए
सभी को कैद करता है 
वह क्रूर है इतना इसलिए कि
उसका मुक्ति से नहीं है परिचय।
मुक्ति के लिए छटपटाने पर 
मुशकें और एड़ियाँ बंधनों से 
उसी तरह छिल जाती है 
जैसे छिल दी गई हो 
रसोई में तरकारी 
पीठ जलती है घिसटने से 
मानों किसीने तैश में आकर 
नर्म चर्म पर मल दिया हो खार 
आत्मा गंदे और भद्दे शब्दों से 
मुक्त होने के लिए 
हो जाती है तार-तार 
जैसे गिलहरी ने कुतर दिया हो 
महीन मलमल का सुकोमल वस्त्र 
इतने सब पर भी हमें चाहिए मुक्ति
चाहे दीजिए संत्रास जी भर-भरकर।
चारों तरफ है 
साँय-साँय करता भयानक सन्नाटा 
जहां जिंगूर चीखते रहते 
रोशनी के अभाव में 
हर आकृति भयावह होती हुई 
चमकाती है दंतावली 
आँगन इतना चिपचिपा कि
रेंगती रहती हैं लिजलिजी सी जोंक 
तिसपर गर्म सलाखों से शब्द 
हृदय को भेदते ऐसे 
मानो काटते सजा काले पानी की 
फिर भी ........
अंतिम सांस तक उम्मीद है 
संवेदनहीन पत्थरों से 
मुक्ति मिल जाएगी इक दिन ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।


अपनी ही तरह से



उदासियाँ पीछा ना करो हमारा
परछाई की तरह
हमसे कोई सरोकार नहीं
हमें मुक्त करो
अपने शुष्क बंधनों से
हमें भी जीना है
कुछ अपने लिए अपनी ही तरह से ।
डर और डर
बस चारों ओर डर
फैल गया हो मानो
बरसाती जलावन के दमघोंटू
मटमैले धुएं सा डर
नित्य भोर के धुले-धुले उज्ज्वल
नवल तारक के दर्शन से भी
दिवस कभी हमारा धवल नहीं होता
उदासियों अब तो अलविदा कहो ।
घर तो घर होते हैं
नहीं होते कारागृह
वहाँ संबंध तो संबंध होते
नहीं होते लोह-वलय
जिनकी छत कच्ची-पक्की होने पर भी
नहीं होती कभी असुरक्षित
लेकिन जब घर में ही
पैदा हो जाए कारा,
उग आते हों लोह-वलय,
फसल असुरक्षा की भर आए
तब धम-धम करती उदासियाँ
छाती पर चढ़-चढ़ आती
और निर्दय होकर पीसने लग जाती
मानो चलते कोल्हू में
काया तिलहन सी पिसती।
उदासी दूर रहो भी
हम अपरिचित
अच्छा हो कि अरे उदासियाँ
शुष्क पत्र सी गिर गिरकर
पदतल के नीचे
चरमर चरमर करती पिस ही जाओ
जिससे कुछ क्षण ही जी लें
खुशी-खुशी अपनी चेतनता से
कहीं दूर क्षितिज पार से
घड़ी की सुई सा
धूप का उज्ज्वल कतरा
चुपचाप सरक रहा है
समय नहीं है बहुत अधिक
उदासियाँ अब कहो हमें - विदा-विदा।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

नवीनता के लिए

जिंदगी और मौत की 
जद्दोजहद में 
अक्सर जिंदगी को ही 
जीतते देखा गया, 
परंतु जब भी जीतती है मृत्यु 
जीवन के पास 
फिर से बाजी लगाने का 
अवसर ही नहीं रहता 
मानो सूरज की प्रखर धूप में 
पानी का भाप बन 
हवा में विलीन हो जाना 
होता है तय।
जिंदगी मुखर होती हुई 
छा जाती है विविध रंग लिए 
जैसे बरसात के मौसम में 
अक्सर तन जाता है इन्द्रधनुष 
लेकिन कुछ ही क्षणों में 
वह विलीन हो जाती है मानो 
समुद्र में उठते हुए फेन 
लहरों की उठा-पटक में 
हो जाते हैं लुप्त
अनन्त जल राशि में ।
जिंदगी भी इन्द्रधनुष के 
जैसे ही होती रहती विकसित 
उसके जैसे ही होती रहती प्रसरित 
धीरे-धीरे चंदोवे सी तनती 
तनकर सजती आकर्षक रंगों में 
फिर अचानक लुप्त हो जाती 
बिना किसी पूर्व सूचना के।
इन्द्रधनुष का लोपन - गोपन
लाता है क्या
गगन में सूनेपन को? 
नहीं - नहीं, 
नहीं मानता सूनेपन को, 
तब फिर आता होगा रिक्त भाग से 
शोक भरा सन्नाटा 
जो घायल करता होगा 
शिशु सम कोमल मन को? 
नहीं - नहीं, 
मैं इसे भी नहीं मानता,
नियति ही कुछ ऐसा करती है 
नव सृजन स्थापित करने को।
जीवन की यात्रा में 
पड़ाव से पड़ाव के मध्य 
कितने ही विकट मृत्यु के 
आघात लगते हैं 
कभी भूख के रूप में 
कभी अभाव के रूप में 
कभी त्रासदी के रूप में 
समस्त आघात सहते हुए 
सजती है इन्द्रधनुष सी जिंदगी 
फिर ऐसा क्या होता है कि 
अचानक जीवन हार जाता है 
मृत्यु के सम्मुख 
दलील दी जाती है संवेदना के रूप में -
नवीनता के लिए मृत्यु पहल करती है।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।