Thursday, 27 March 2014




जहां-तहां भिड़ रहे , मेवाड़ी-मुग़ल भट ,
खनन खनन खन , तलवारें बोलती .
कहीं तोप गरजती , गोले छोड़ छोड़ कर ,
गनन गनन गन , भुशुण्डी भी बोलती .
रणक्षेत्र हल्दीघाटी , गूँज गया धमक से ,
धनन धनन धन , धरती भी बोलती .
चेटक सवार राणा , रणक्षेत्र चांपते हैं ,
टपक टपक टाप , अश्व टाप बोलती .

काल सम काली-काली,दागती है तोप गोले ,
कुछ नहीं सूजता है , धूल भरे मेघ में .
धूल भरे मेघ देख , बढ़ते हैं पद दल ,
आपस में गुंथ भट , काटते हैं वेग में .
कहीं गज कट गिरे , कहीं अश्व कट गिरे ,
कट-कट सुभट भी , रुंदते हैं पैर में .
कर रहे सञ्चालन , रण को प्रताप ही ,
मुगलों के मुंड उड़े ,  प्रताप की तेग में 

Tuesday, 25 March 2014

तब शिकायत मत करना।

अक्सर ही अभाव से 
कभी व्यक्ति 
कभी पूरा गाँव 
कभी पूरा का पूरा शहर 
घायल हो जाता है 
हर एक स्थिति में
टप-टप करते आँसू व्यर्थ नहीं होते
एक दिन जागेगी गीली आंखे  
उठेगा ज्वार आंसुओं का 
कारण अभाव के बह जाएँगे 
तब शिकायत मत करना।


जब भी तराजू सा 
डोलता है 
कभी व्यक्ति 
कभी पूरा गाँव 
कभी पूरा का पूरा शहर
इस दोलन की स्थिति में 
टप-टप करते श्रमकण व्यर्थ नहीं होते 
एक दिन संत्रस्त चरण जम जाएंगे
वे करेंगे भीषण आघात 
कारण विचलन के कुचल जाएँगे 
तब शिकायत मत करना।


धान की पकी फसल सा 
बिखर जाता है 
कभी व्यक्ति 
कभी पूरा गाँव 
कभी पूरा का पूरा शहर
इस बिखराव की स्थिति में 
टप-टप करती रक्त बूंदे व्यर्थ नहीं होती 
एक दिन उठेगी नई फसल
करेगी भीषण आक्रोश 
कारण बिखराव के जल जाएँगे 
तब शिकायत मत करना।


एकसूत्र बांधती है कविता 
बंध जाता है 
कभी व्यक्ति 
कभी पूरा गाँव 
कभी पूरा का पूरा शहर
इस संगठन की स्थिति में 
टप-टप उगते शब्द-अर्थ व्यर्थ नहीं होते 
एक दिन संवेदनहीनता के विरुद्ध 
भीषण शंख फूँकती 
क्रूर काली सी कलम बने 
तब शिकायत मत करना।


-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज.)


Friday, 21 March 2014

वह बचपन मेरा

मैंने बचपन को फैलाया
कागज पर ,
रंग फैले या मैं फैला
कागज पर ,
हाथों से फिसल गया
रेत घड़ी सा
वह बचपन मेरा ।

बिना किसी की लाग लपेट
जो अंदर था
वो बाहर आया ।
नीला-पीला या श्वेत-श्याम था
जैसा भी था
वो आया ही आया।
संत सरीखा,
वह बचपन मेरा ॥

रंगो की कब कहाँ प्रतीक्षा
जो मिट्टी थी
वो भी रंग होता।
पानी रंग सा रंग पानी सा
हाथ लगा पंक चाहे
वो रंगों का राजा होता ।
भूला-भटका,
वह बचपन मेरा।।

सब की जात-पाँत अपनी ही
जैसे तीर्थाटन में
सब अपना होता।
इसका खाया उसका पीया
बचपन भला कहाँ मानता
सब अपना होता।
द्वन्द्वो से खाली
वह बचपन मेरा॥

लो होली पर खोज रहा हूँ
विगत दिनो की
ले-ले रोकड़ बहियाँ।
अपने वातायन देख रहा हूँ
वे रंग भरी
परिचित गलियाँ।
फिर कैसे लौटाऊँ
वह बचपन मेरा॥

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

सच पूछो तो बात अलग है

( नव गीत )
सच पूछो तो बात अलग है
कोरे कागज़
काली स्याही जब शब्दों से
खरी बात कह आग लगाती
सच पूछो तो  बात अलग है।

पुष्पित उपवन  ,
अपने माथे अंगारों से
पुष्प सजा विद्रोह दिखाता
शपथ से कहता आग अलग है।
सच पूछो तो  बात अलग है।।

जब हंसों ने
मुक्ताओं का मोह छोड़ के
पाषाणों को राग सुनाया
ज़रा कान दो  राग अलग है।
सच पूछो तो  बात अलग है।।


अलमस्तों ने
प्राण हथेली पल में रख कर
प्राणों को निज देश पे वारा
सुर्ख धरा का  भाव अलग है।
सच पूछो तो  बात अलग है।।

शव सा रह के
कब तक शोणित व्यर्थ करेगा
ज़रा कपोलों पर शोणित मल ले
दीवानों का  फाग अलग है।
सच पूछो तो  बात अलग है।।

इतिहासों ने
उसे सहेजा जो लीक छोड़ के
आँख मिलाने चला काल से
यह जीवन का  भाग अलग है।
सच पूछो तो  बात अलग है।।
               

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द ( राजस्थान )

अपनी मिट्टी से

चाहता हूँ मिलूँ अपनी मिट्टी से।
कई रंग मिलते अपनी मिट्टी से॥

रंज और गम क्यों रखूँ अपनों से।
एक रिश्ता भी है अपनी मिट्टी से॥

बुरा भी भला ही लगा है हरबार ।
जो कोई जन्मा अपनी मिट्टी से॥

खूँ अचानक उबाल मार जाता है।
चीखेँ जो आई अपनी मिट्टी से॥

आग बरसी थी वो जुलसाती रही ।
राहतें तब आई अपनी मिट्टी से॥

घुटन और बन्दिशें भी हैं अब कहाँ।
मुझको पंख मिले अपनी मिट्टी से।।

उड़ान भरनी होगी आसमान तक।
हाथ मिलाने को अपनी मिट्टी से।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित राजसमंद।