Tuesday, 30 July 2013

जिज्ञासा

कहने को आँखे खुली है ,
पर ,
तुम ने देखा नहीं ,
नहीं करते प्रतिक्रिया ,
इस अजीबोगरीब ,
आचरण से ,
मितली आ रही है .

एक बात पूछूं ,
नाराज मत हॉना ,
बस ,
मेरी जिज्ञासा है ,
शमन करें ,
बहुत भला होगा ,
ऐसे हालातों में ,
ज़िंदा भी हैं ,
या ,
बिल्कुल मरे हुए .


-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द (राज.)

Sunday, 7 July 2013

बंद कमरों में .

बंद कमरों में कभी ,
तस्वीर बदली है ,
बदलना चाहते हो ,
वर्तमान की मुद्राओं को ,
ज़रा बाहर आ कर ,
पूरे दम के साथ ,
एक लम्बी ,
सांस भर कर देखो ,
हवा में कितनी नमी ,
कितनी गिर्दी या ,
कितनी गर्मी भरी हुई है ,
तब कहीं जाकर ,
तस्वीर बदलेगी .

ज़रा मिट्टी की ,
सुनना सिसकियाँ ,
जो बंद कमरों में ,
तुम्हारे ,
मानसिक विलास की ,
लिजलिजी दुर्गन्ध की ,
घुटन से फूट जाती हैं .
यही मिट्टी ,
जब भी मरती ,
कितने ही मानसिक विलासी ,
इस में क्षार होते हैं .

जब बंद कमरों में ,
बदलाव की बातें ,
करी जाती ,
जैसे अभी ही उत्सर्ग होगा
और ,
बंद कमरों की दीवारें ,
साक्ष्य बनकर प्रेरणा देगी ,
परन्तु ,
बंद कमरों में फूटे ,
असंतोष के स्वर ,
पुरस्कारों की होड़ में ,
कतारबद्ध देखे जाते ,
तब ,
क्षोभ से भर जाती हैं ,
छातियों से रिसती ,
पसीने की श्वेत धाराएं .
हाय ! ऐसा संघर्ष का ,
बौना रूप भी होगा ,
जिसे देख कर आँखें ,
धरती में गड़ी जाती .


त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द ( राज.) 

बहुत जद्दोजहद है

तुम्हारे लिए प्यार के 
मायने क्या हैं ?
मैं इस बहस में ,
कभी शामिल नहीं हूँ .
मेरे लिए प्यार ,
शाख पर लरजती हुई ,
कोमल पत्ती की तरह है ,
जो कि ,
शाख पर लग कर ,
खुद जीती है ,
और पेड़ में ,
प्राणों का संचार करती है .

प्यार कोई चिड़िया नहीं ,
नहीं वह कोई ,
खूबसूरत दस्तकारी .
प्यार कोई वस्तु नहीं ,
नहीं वह कोई ,
रसीली कलमकारी .
प्यार मधुर भावनाओं का ,
जीवंत स्पंदन ,
स्वयं चलता है ,
सुकोमल दिल के साथ ,
और,
कारवां जीवन का ,
हरदम साथ लिए चलता है . 

उलझ कर रह गया है ,
जीवन का अभिमन्यु ,
सत्ता के चक्रव्यूह में ,
फिर से दोहराया जाएगा ,
वही पौराणिक मिथक ,
जहां अंधों से दृष्टि वाले ,
अधिकारों को मांगेंगे ,
ऐसे में प्यार पर बहस ,
ठीक नहीं लगती .
ना जाने किस मोड़ पर ,
मैं प्यार को ,
साकार देखूंगा ,
अभी तो बहुत जद्दोजहद है ,
जीवन के समर में .


-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.