Saturday, 23 February 2013

अब सहा जाता नहीं .



सरोवर में नित्य कंठ सूखे , अब सहा जाता नहीं .
पानी का मर जाना हम को, अब सहा जाता नहीं.

हलक तर करने के लिए ही , हम सरोवर खोदते .
खुले में अधिकारों का मरण ,अब सहा जाता नहीं.

शुष्क  होठों पर जीभ फिराये , सांस लेते जा रहे हैं.
पर मछलियों का वो तडफना,अब सहा जाता नहीं.

कल तलक तो हम सोचते , आयेंगे वे पानी लिए.
पर धुंआ उड़ाते लौट आते , अब सहा जाता नहीं.

तड़फती पाई मछलियाँ को , पहले सहलाना है .
फिर दावतें उन की उड़ाना , अब सहा जाता नहीं.

जल  रही  थी बस्तियां तब , उन को कहाँ  देखते.
वो भीड़ में उनका सिसकना ,अब सहा जाता नहीं.

हाथ उनके बढते  प्यार से , सहलाने  में गाल को .
फिर पेट की तली  नापना , अब सहा जाता नहीं.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.


दहशत लाये हैं ,कुछ पागल हैं .


कुछ  वहशी हैं , कुछ पागल हैं .
दहशत लाये हैं ,कुछ पागल हैं .

सभी चल दिये , अमन की डगर.
अमन कुतरते वे ,कुछ पागल हैं .

प्यार से गीली हैं , गली हमारी .
नमक बिछाते वे ,कुछ पागल हैं.

मिले हुए दिल ,कटते भी कहीं .
काटने पर तुले , कुछ पागल हैं.

पकी हुई फसल , मुहोबतों की .
रास नहीं जिन्हें , कुछ पागल हैं.

सेकना चाहते ,सियासती गोटी .
वे जलाते बारूद ,कुछ पागल हैं .

जानते ही नहीं , हमारी फितरत .
हम मिट्टी में सने,कुछ पागल हैं.

मिट्टी में जियें हैं , मिट्टी में मरेंगे .
तबियत ही ऐसी , कुछ पागल हैं.

तिरंगे की कसम ,यार अब सुधर.
चिरोरी होगी नहीं, कुछ पागल हैं.

बारूदी धमाके , मार सकते नहीं.
मर-मर के जिए ,कुछ पागल हैं.

मिटाने पर भी ,जो मिटती नहीं .
हस्ती हमारी भी , कुछ पागल हैं.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द .

Wednesday, 20 February 2013

अभिव्यक्ति के पर आये हैं


चिड़िया की हुई बगावत है , ज़रा संभल के चल .
कबूतर ने भी पर खोले हैं , ज़रा संभल के चल.

तेरे कलदार चला करते थे , कभी खुले गगन में .
अब तेरी टकसाली बंद हुई , ज़रा संभल के चल .

तेने अपने पंख फैला कर , हरदम डर घोला था.
सब परिंदे उड़ने को आतुर , ज़रा संभल के चल .

काल सरीखे तेरे पंजों ने , तन-मन चीर दिये थे .
चिड़िया ने चोंच उठाई है , ज़रा संभल के चल.

तेरे काले साये से डर कर , जो पेड़ों में छिपते थे,
वे सब मरने को ही चल पड़े , ज़रा संभल के चल .

ठकुरसुहाती करने वाले , ओ काले कौए तू सुन .
अभिव्यक्ति के पर आये हैं , ज़रा संभल के चल .

                                - त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

Sunday, 17 February 2013

संवेदना तो मर गयी है


एक आंसू गिर गया था , एक घायल की तरह .
तुम को दुखी होना नहीं , एक अपने की तरह .

आँख का मेरा खटकना , पहले भी होता रहा .
तेरा बदलना चुभ रहा , महीन रेत की तरह .

गर्म नारों से बदलना , चाहते थे हम सभी को ,
अब हवा में उड़ रहे हो , शुष्क पत्ते की तरह .

मेरी कमीजों पर कभी , तुम गुलाब से थे सजे .
अब हो गए भाव वाले , तुच्छ कागज की तरह .

दुःख नहीं है इस बात का , पास मेरे आते नहीं
खून तेरा क्यों हो गया है , खार पानी की तरह .

लोग अब भी आश्वस्त हैं , राहतें ले आयेगा ही.
वे आसमान में ताकते हैं , भक्त लोगों की तरह .

अब मुझे मालूम है कि , दिल तेरा सुनता कहाँ .
संवेदना तो मर गयी है , व्यर्थ उपमा की तरह.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

Thursday, 14 February 2013

अग्नि पे चुम्बन उगते हैं.


आशाओं  पर सब पलते हैं .
तप के ही अंकुवे निकले हैं .

मांझी सोचे ,
किश्ती लेकर .
घर आऊँगा ,
खुशियाँ लेकर .

कौन कहे वह ,
घर को आये .
कौन कहे वह ,
सागर बस जाए .

लहरों पर मांझी चलते हैं.
छोटी किश्ती पे मचले हैं.

वो दीवाने  ,
तट  आते हैं.
लहर पीट के ,
घर भरते हैं.

रात कटी है ,
अपने ले कर .
भोर चले फिर,
सपने ले कर .

झंझा पर सपने बसते हैं.
अग्नि पे चुम्बन उगते हैं.

कल उन का भी ,
घर होगा .
घर में किस का ,
डर होगा .

गर्म तवे से ,
गंध उठेगी .
मृदुल भुजाएं ,
अंक कसेगी.

आशाओं  पर घर चलते हैं .
पतझड़ पर बसंत फलते हैं .

                    - त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

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Tuesday, 12 February 2013

यादें ऐसे गुंथ गयी , फूल हो कपास का.



यादें ऐसे गुंथ गयी , फूल हो कपास का.
सोलह कलाएं लिए, चाँद हो आकाश का .

जिंदगी तकली बनी ,
गोल-गोल घूमती .
यादों का कपास लिए ,
नर्म सूत्र कातती .

बंध उन के खोल दूं  ,खेत हो कपास का .
यादें ऐसे गुंथ गयी , फूल हो कपास का.

दिन कमल सा खिले ,
यादों का सूरज लिए .
दिन कमल सा ढले ,
यादों का सूरज लिए .

यादें नित्य काटती , वेग प्रीत प्रवास का.
यादें ऐसे गुंथ गयी , फूल हो कपास का.

मोन की आयोजना में ,
सलवटें ही बोलती .
सच कहूं तो जिन्दगी ,
बावरी सी डोलती .

हर गली में शोर है , यादों के उजास का .
यादें ऐसे गुंथ गयी  , फूल हो कपास का.

                                           -त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

Sunday, 10 February 2013

उजाले की नदी ले कर जो तुम आये .



उजाले की नदी ले कर जो तुम आये .
किनारा ही पा लिया है जो तुम आये .

अंधेरों में बहुत कड़वे ,
घूँट ही उतारे हैं .
कई कंकड़ कई कांटे ,
हाथों से बुहारे हैं .

बहुत घावों को भूले हैं जो तुम आये .
उजाले की नदी ले कर जो तुम आये .

होठों को बंद किये बैठे ,
थे बहुत पहरे .
सुनता कौन हमारी पीर ,
थे सभी बहरे .

गूंगे भाव गीत बन बैठे जो तुम आये .
उजाले की नदी ले कर जो तुम आये .

चलो छोडो उनको अब,
हमें क्या कहना है .
दरिखाने में फूलों को ,
उन्हीं को सहना है.

आँखों से नहीं दिखता जो तुम आये .
उजाले की नदी ले कर जो तुम आये .

                    - त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.


Saturday, 9 February 2013

कहे चेतना , दिल से सुन .


कुछ कहता हूँ , उस को सुन .
दिल की बातें , दिल से सुन .

कागज़ की नौका,
जल की धार.
मिट्टी का माधो
लिये पतवार.

आँख से देख , ठीक से सुन .
धारा का वेग , दिल से सुन .

नौका तिरती  ,
धारा-अनुकूल .
नौका डूबती ,
धारा-प्रतिकूल .

सुप्त चेतनता ,जागे तो सुन .
क्षण भी बोले , दिल से सुन .

अनुभव-अनुभव ,
अपनी ही पूँजी .
दिव्य चेतना ,
सब में ही कुंजी.

हाथ बोलते , क्षण से सुन .
कहे चेतना , दिल से सुन .

                     - त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

Friday, 8 February 2013

अंतिम क्षण तक

बहुत दूर से ,
कोई निमंत्रित करता है ,
पर ,
मैं हूँ कि,
लाख प्रयत्नों के ,
बाद भी जा नहीं पाता हूँ ,
मुझे डर है अपनी ही जड़ों से,
कट जाने का 
और,
अपनी जड़ों की ,
मिट्टी को खो देने का.

मैं जिस धरा पर खडा हूँ ,
वह चोकोने कागज़ की तरह ,
रोज बंट रही है,
बंटी हुई धरती के टुकडे 
कागज की पन्नियों की तरह ही ,
इधर से उधर छितर रहे हैं ,
मैं जिस टुकडे पर खडा हूँ ,
वह भी रोज हिलता है ,
शायद एक दिन वह टुकड़ा भी ,
अन्य टुकड़ों की तरह उड़ जाएगा ,
और ,
वह जगह ,
किसी अन्य की होगी ,
तब मेरे हल्के भार पर ,
भारी पेपरवेट हंसेगा.

हर बार पत्र में लिखा होता है -
चले भी आओ ,
आखिर वहां क्या रखा है ?
जो भी तुम वहां रह कर ,
नहीं जुटा सके ,
वह सब का सब तुम्हे ,
अनायास ही यहाँ मिल जाएगा .
....................( ऐसा ही बहुत कुछ )
हर बार मुझे उन पत्रों पर ,
चिढ हो आती है ,
मैं उन्हें अपनी करतली में, 
भींच-भांच कर ,
जोर से धरा पर पटक देता हूँ ,
हाँ , उसी धरा पर ,
जो कागज़ की तरह ही ,
रोज-रोज बंट रही है ,
लेकिन इस बंटती हुई ,
धरती से भी, 
मुझे बेहद लगाव है,
क्योंकि ,
मेरी पहचान इसी ,
बंटती हुई धरती से है ,
और ,
इस पहचान को बनाने में ,
मेरे जीवन का स्पंदन ,
किसी भव्य अनुष्ठान की ,
मंत्र-आहुति में ,
समिधा सा आहूत हुआ है .

मेरे साथ पनपता है ,
कोई महावृक्ष ,
पादप -लता या झाडी भी ,
तो मुक्त हो कर पनपे ,
उस से तो मुझे सदा ही ,
परितोष मिलेगा ,
क्योंकि ,
सब के होने पर ही ,
यह संसार फलीभूत होता है ,
तब इन संस्थितियों में ,
मेरा भी होना ,
अत्यावश्यक सा है .
यही विचार मुझे निरंतर ,
अपनी जड़ की मिट्टी से ,
जोड़ रहा है ,
मेरे जीवन के अर्थ समान ,
इसीलिए मेरा प्रयत्न है -
यहीं खडा रह , यहीं जमा रह ,
अंतिम क्षण तक रोक रखूँ ,
इस धरा को बटने में कागज समान.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

Tuesday, 5 February 2013

शहर - कल और आज


उत्सव के प्रांगण सा ,
देखा था शहर ,
सब कुछ नैसर्गिग स्वरूप में ,
चलता था .
रोज बैल-गाड़ियों में ,
खानों से लदे फंदे आते थे पत्थर ,
जिनमें गाड़ीवान बड़े मजे से
फूंक रहा होता था तम्बाकू ,
और बैलों के गले में ,
रुनझुन-रुनझुन करती घंटियाँ ,
एक कसैला गीत गूंजता ,
शहर के चलते पथ को ,
इंगित करता था .
वहीँ नंग-धडंग लांगुरिया का टोला ,
भरी नहर के बहते पानी में कूद-कूद,
सारे शहर को स्वर देता था .
अब ना जाने कहाँ बैलगाड़ियां ,
मोटर की धमा चोकड़ी में ,
कहीं कोने में धूल फांकती ,
या, दीमक का ग्रास बनती खोती है ,
पानी वाली नहर में,
पानी के संग मेला घुल कर ,
सड़ांध मार कर ,
अपने परिवर्तन पर रोती है ,
जैसे कोई नगर-वधु ,
अपने रुज-ग्रस्त तन से घिन भरती है .
कल का लंगुरिया का टोला,
चुर्री ,पन्नी और भूरी शक्कर के कश में ,
या बोतल के पानी के घूँट घटक ,
सोया है लावारिस सा ,
अब शहर चिल्लाता है.

किसी तीर्थघाट सा ,
या वृन्दावन सा ,
देखा शहर ,
जहां झील के घाटों पर स्त्री-पुरुषों के झुण्ड ,
नत नयनों से वस्त्रों को पटक-पटक कर ,
उज्ज्वलता को पाने के प्रयत्न में ,
मानों नीले ठंडे पानी से शुचिता ही ,
घर ले जाने को हैं तत्पर ,
उधर दूसरी ओर ,
सप्तध्व्जाधारी द्वारकाधीश-मंदिर से ,
दर्शन का हेला हो जाता,
तब ,
बच्चे -बूढ़े, स्त्री-पुरुषों को ,
मंदिर की चौखट पर ,
शीर्ष नवाते देखा ,
तुलसीपत्रों को कर-कमलों में बंद किये ,
पाटलपत्र सरीखे होठों पर स्वस्तिवाचन करते ,
अपरिचित में भी परिचित का अनुभव भर-भर ,
नागर-जन के चन्दन-चौवा की सौरभ से ,
सारे शहर में अपनापन भर जाता था .
अब झील कभी-कभार भरती है ,
भरी झील का पानी अमृत सा ,
दिन प्रति दिन बहुत विषैला ,
जिस को छू लेने में भी डर लगता है .
घाटों पर अब वह मर्यादा कहाँ रही ,
हर कोई बंद हुआ ,
फव्वारे में ही गीला होता है .
मंदिर के पट रोज खुल रहे ,
तुलसीपत्रों और स्वस्तिवाचन ,
अब उपास्य के चरणों से ,
विलग नहीं हो पाते ,
अब शहर अपरिचय के अन्दर ,
अपना दम घोंट रहा है.

प्रति दिवस की ,
प्रथम किरण से ,
किसी मेले-ठेले सा ,
सजता देखा शहर ,
दूधिया साइकिलों की ,
खड़-खड़, खड़-खड़,,
ट्रिन-ट्रिन , ट्रिन-ट्रिन में ,
फेरी वाले , सब्जिवालें ,
चक-चक चिल्लपों में ,
हर घर को नाम लिए पुकारते ,
जैसे वे अपने सम्बन्धी के घर आये हैं ,
गृहवधुएँ उतने ही अनुराग से ,
उन से दूध-दही ,सब्जी-भाजी लेती ,
एक मधुर स्मित से ,
सबको उन का दाय सौंपती ,
या,
सहज भाव से कल फिर आने का न्यौता दे देती ,
वे भी अपनत्व भाव से शीर्ष हिलाते , मुस्काते ,
ऐसे आगे बढ़ जाते थे मानों ,
यह तो उनके अर्थ-शास्त्र का हिस्सा है ,
इसी अर्थ-शास्त्र के अघोषित विधान में ,
सारा शहर विकास पाता था .
अब फेरी वाले से लेकर दूधिये तक ,
सब धीरे-धीरे कहीं गुम होते जाते हैं ,
बड़े शहर की तरह ही अब ,
डिब्बों और थैली में बंद सामग्री ,
सब्जी-भाजी फल तक मोल में बिका करते हैं
कृत्रिम हंसी में जहां तन्वंगी कन्याएं,
आधुनिक अर्थ-शास्त्र का हिस्सा है,
जिस में अर्थ प्रमुख बाकी सब गौण हुआ जाता है ,
अब शहर हमेशा
अपने गुणा-भाग में जीता है.

वीथी-वीथी चौराहे पर ,
किसी कर्मक्षेत्र सा ,
व्यस्त देखा शहर ,
लोहारों की धोंकनी ,
धप-धप कर हांफा करती ,
मोची की रांपी ,
खप-खप करती ,
चर्म-पट्ट पर चहका करती ,
नापित की गर्म अंगुलियाँ ,
खल्वाटों पर आपस में गुंथ ,
खटपट -खटपट कर इठलाती ,
दर्जी का फीता- कैंची-अंगुस्तान ,
सिलाई की मशीन के ,
गर्र-गर्र के श्रुति-कटु नाद में ,
भर्र-भर्र कर नाचा करते ,
पिन्जारे की धुनकी,
धुनक-धुनक कर रुई के फोहे ,
बर्फ के गोले से उडाती ,
ऐसे ही बढई -जुलाहे ,
रंगरेजों और छींपों की ,
कुम्भकार-स्वर्णकार ,
माली-धोबी ,मजदूरों और कारीगर की ,
अपनी-अपनी रचना चलती ,
हर रचना श्रम का गीत रचाती ,
ऐसे ही लघु रचना से ,
भरा-पूरा शहर बसता था .
अब बड़े-बड़े पूंजीपतियों के आगे ,
सब के सब कहीं मर गए ,
धोंकनी -धुनकी , कैंची- रांपी ,
कहीं नहीं दिखाई देती ,
सिक्कों की चकाचोंध में ,
अब शहर सिसकता जाता है.

पर्वों और त्यौहारों में ,
अपनी ही मस्ती में देखा शहर ,
ढोली घर-घर आकर,
ढोल बजाकर त्यौहारी लेते ,
भाटों और चारण अपनी पोथी पढ़-पढ़ ,
वंश-विरुद को गा-गा कर ,
अपना-अपना अधिकार जुटाते ,
वनवासी आकर गेरू दे जाते ,
जिस से घर-घर के आंगन में ,
चित्रित अल्पना और मांडने में ,
जीवन झलकाया करते,
संझा का चित्रण और सेवरा ,
घूमर-घेर ,रास-डांडिया ,
होली-दीपावली-ईद-दशहरा ,
रक्षाबंधन- मकर संक्रांति ,
वैशाखी-नागपंचमी जैसे ,
अनगिन त्योहारों-पर्वों पर ,
हर-घर का आंगन खुल जाता था ,
मीठी गंध नथूनों में आकर ,
बरबस आकर्षित करती थी ,
तब बिखरा हुआ शहर ,
फिर से महाकुम्भ सा ,
एकत्रित हो जाया करता था.
अब अंतरजाल के संबंधों में ही
जीवन उलझ गया है शफरी सा ,
उत्सव-पर्वों और संस्कारों को ,
अब शहर चित्र में देख रहा है.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

Saturday, 2 February 2013

सरस बसंती हवा बही है .


सरस बसंती हवा बही है .
स्मृतियों की नदी बही है.

गेहूं के खेतों में,
सुरभि की तरह ,
बहते हुए ,
तुम्हारा चले आना .
गेहूं के सुकोमल ,
नन्हें-नन्हें हरे ,
पन्नग से पौधों में ,
तुम्हारा पानी रलकाते गाना -

पीली सरसों साथ उगी है.
सरस बसंती हवा बही है .

अंतर के मधुर स्वप्न ,
बिखर कर ,
जब भी छू मंतर हो जाते ,
मेरा मुख म्लान हो जाता ,
तब मेरा ध्यान ,
अपनी और खींचने के लिए ,
मचान के ऊपर चढ़ ,
तुम्हारा जोर से पुकार उठना -

देखो अलसी खूब फली है .
सरस बसंती हवा बही है .

सब के साथ
दौड़ की होड़ में ,
जब-जब थक कर ,
मैं चूर-चूर हुआ ,
तब मेरे निश्चेष्ट पड़े ,
तन-मन में ,
प्राणों का स्पंदन ,
मधुर स्वर से कर दिया -

धानी चूनर खूब सजी है .
सरस बसंती हवा बही है .

किस तरह से मैं ,
तुम्हारे प्रति ,
अपना अनुग्रह ,
व्यक्त कर सकता हूँ ,
मेरे जीवन पथ के ,
हर ऊंचे-नीचे पथ में ,
तुम्हार चरण-चिह्न ,
स्पष्ट देख कह सकता हूँ -

मेरी भी आँखे खूब भरी हैं .
सरस बसंती हवा बही है .


   - त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

विकराल लहरों के नियंता



तू ने ही प्रेम की पींगे बढाई,
फिर मुझे कहा -
चल लहर पर चलते हैं ,
मैंने रोका था ,
पर तुम कहाँ मानने वाले ,
तुम पर प्रेम की खुमारी ,
इस तरह चढ़ चुकी थी ,
जैसे चढ़ गयी हो ,
अंगूर की बेटी .

लहरों की सवारी ,
इतनी आसान ,
नहीं हुआ करती,
हाँ ,
उन पर थोड़ी देर ,
जी जरूर बहलता है ,
परन्तु जैसे ही ,
ले लेती है विशाल रूप ,
तब दैत्याकार लहरें ,
नाग की तरह ,
लीलने को आतुर होती है ,
तब तुम्हारा प्रेम ,
कहीं हवा हो जाता है ,
और ,
सब कुछ हो जाता है बदरंग.

ऊपर-नीचे होते हुए ,
इतने डर जाते हो,
और ,
डर के मारे ,
सारा दोष
मेरे ही सर मढ़ देते हो,
यार ,
बहुत कायर हो ,
जो लहरों से डरते हो ,
मेरा हाथ छिड़क ,
निर्जीव नौका की ओर,
खींचे चले जाते हो ,
क्या यही तुम्हारे
प्रेम की है पराकाष्ठा ?

मेरी एक बात पर ,
तुम यकीन करो ,
ये तमाम लहरें ,
हमने ही उठाई है ,
क्योंकि,
हमने ही समंदर में,
गहरे तक झांका है ,
हमने ही तूफान
आमंत्रित किये हैं ,
और,
हमने ही ,भंवर पर भंवर
पैदा किये हैं ,
हाँ ,हम ही कारण हैं ,
हाँ ,हम ही कर्ता है ,
फिर तो हम ही हुए ना,
विकराल लहरों के नियंता ,
फिर डर काहे का.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.