Sunday, 30 September 2012

अपने ही पापा के घर.



मैं तितली सी ,
सदा रही हूँ ,
सतरंगी पंख लिए
अपने ही पापा के घर.

खाई - खेली ,
तुतलाई हूँ ,
उठी - गिरी हूँ ,
इठलाई हूँ ,
दुनिया से ,
दो बातें करना,
मैंने जाना ,
अपने ही पापा के घर.

अकडम - बकडम,
के खेलों से ,
इत्ती-बित्ती ,पंचा कांकर,
के खेलों से ,
जीत -हार का मतलब ,
परिभाषित करना ,
मैंने जाना ,
अपने ही पापा के घर.

भाई-बहिनों से  ,
सीख वकालत ,
संगी-साथी से ,
मान-मनोवल  ,
रिश्तों की मधुर गंध,
को रूपायित करना ,
मैनें जाना ,
अपने ही पापा के घर.

रेत-ढूह में खूब घरौंदे ,
रच-रच कर के ,
खेती-बाड़ी छत-आँगन ,
रच-रच कर के ,
गुड्डे - गुडिया की दुनिया से ,
वर्तमान को सहेजना ,
मैंने जाना ,
अपने ही पापा के घर .

अब सहेजती ,
प्रियतम का घर ,
रोके-मौके आना-जाना ,
अब पापा के घर ,
सरस बादली बन कर छाना ,
हर उष्मा पर बरसना ,
मैंने जाना ,
अपने ही पापा के घर.

Thursday, 27 September 2012

घूँट-घूँट ही सही मुझे दर्दों को पीने दो .


         निर्जन कौने में बैठा
              वह पीता है,
          उसको रोका तो बोला
घूँट-घूँट ही सही मुझे दर्दों को पीने दो .

        रूखे व्यवहारों से मारा,
                 वह रोता है ,
          बिंधा हुआ वह बोला ,
पहचान मिली अब ऐसे ही जीने दो .

         टूटन-दरकन में जीता ,
               वह दबता है,
    कलम उठाई तो वह बोला ,
इन कलमों को अब तीखा लिखने दो .

     अश्रु - मिट्टी लिए साथ में,
             वह सनता है,
     नमक उठा कर वह बोला ,
खार लगाना वो चाहे तो लगने दो .

         अपने घावों को खोले ,
            वह कंपता है,
      अँगुलियों पर गिनते बोला,
मेरे दिन भी आते हैं अब मिलने दो .

     

Wednesday, 26 September 2012

जीवन का रूप सामने आ जाए.


मैं आऊँ या ना आऊँ ,
अब तुम आना ,
आ कर के यों घुल जाना ,
जैसे पानी में पानी घुल जाए.

तुम को देखूं या ना देखूं ,
अब तुम देखो ,
इतना देखो तुम मुझ को ,
दोनों आँखें पूरी ही भर जाए.

तुझे ओढ़ कर फटे हाल हूँ ,
अब तुम ओढो ,
इतना ओढो तुम मुझ को ,
सारा सच बाहर को आ जाए.

जिन गीतों को मैंने गाया ,
अब तुम गाना,
उन गीतों को ऐसे गाना ,
ह्रदय तेरा बाहर को आ जाए.

मैं रिश्तों में खेल बना ,
अब तुम खेलो,
उन रिश्तों को ऐसे खेलो ,
जीवन का रूप सामने आ जाए.

Sunday, 23 September 2012

सच! कहाँ रहते हो ?


सच ! कहाँ रहते?
घर-परिवार ,अन्दर-बाहर ,
तन में,मन में,बुद्धि-बल में ,.
पर,
ये सब तो बिखरे है ,
किंचित इन में प्राणों को सींचूं .

जन में ,गण में ,उपवन में ,
शहरों - कस्बों या ग्रामों में ,
पर ,
ये सब तो अस्त-व्यस्त है ,
किंचित इन को किरण दिखा दूं .

शैशव-कैशोर्य-योवन में ,
प्रौढ़ता या जरावस्था में ,
पर ,
ये सब तो बहुत डरे हैं ,
किंचित इन को निर्भय कर दूं .

लेखन - चिंतन - गायन में ,
आख्यायन या चित्रायन में ,
पर ,
ये सब तो अलग-थलग है ,
किंचित इन को संयोजित कर दूं.

तर्कों - वाणी - प्रमाणन में ,
रीति-नीति-छंदानुशासन में ,
पर,
ये सब तो वाग्विलासी हैं ,
किंचित इन को जीवन दिखला दूं .

ध्यान - धारणा - समाधि में ,
आवर्तन-परावर्तन-पलायन में ,
पर,
ये सब तुझ से बहुत विमुख है ,
किंचित इन को दिशा दिखा दूं .

नव अंकुरण के उल्लास में ,
श्वांसों के तू मुक्त विलास में ,
पर,
ये सब तेरा मूर्त रूप है ,
किंचित इन से ही झोली भर लूं.

Saturday, 22 September 2012

तब तक खोल चलूँ वे खिड़कियाँ .


   मैंने चाहा खुल जाए ,
          बंद पड़ी
     कुछ खिड़कियाँ .
हर खिड़की से चेहरा झाँके  ,
चेहरा देखे चलती गलियाँ .

   बंद कपाटों के पीछे तो
          सिसक रही
        बस सिसकियाँ
हर सिसकी में अपना रहता ,
अपना मांगे अपनी खुशियाँ .

     सतरंगी पंख फैलाये ,
            उड़ना चाहे ,
         कुछ तितलियाँ .
नम्र पवन अब देती निमंत्रण ,
देती निमंत्रण कोमल कलियाँ .

   आती होगी तुम को भी ,
          मीठी-मीठी ,
         कुछ हिचकियाँ ,
समझ लेना अपना ही भूखा,
झूझ रहा कर के मधुकरियाँ.

    दर्द ह्रदय में करवट ले के
             तीखी काटे
           कुछ चुटकियाँ ,
तब साथ मेरे तुम चल सकते हो ,
तब तक खोल चलूँ वे खिड़कियाँ .

Thursday, 20 September 2012

कुछ मशालें दहती हैं .

दीवारों से जो गिरा हुआ हूँ ,
मुक्ति की बस चाह रखी है ,
हाथ लगाकर दीवारों को ,
         सहलाया ,
   धीरे-धीरे ही सही पर ,
   रेत हुई वह ढहती है .

इधर दीवारें - उधर दीवारें ,
घने तमस में निराकार हैं ,
सिकुडन व एकाकीपन को ,
         बतलाया ,
   धीरे-धीरे ही सही पर ,
   इक चिंगारी जलती है .

भारी भरकम लगी बेड़ियाँ ,
खन-खन करती हैं झंझीरें ,
बंधन में जो लिए ऐंठ है ,
         टकराया ,
   धीरे-धीरे ही सही पर ,
   स्वर विद्रोही भरती है.

घायल तन और मन घायल,
सहलाती अंगुलियाँ घायल,
दर्द दमन जब रूपायित कर ,
         दिखलाया ,
   धीरे-धीरे ही सही पर ,
   नदी आग ले बहती है.

कहाँ दिवस और कहाँ रात है ,
तेरे ही कहने से पता चला है ,
मुक्ति का गायन श्वासें करती ,
         समझाया ,
   धीरे-धीरे ही सही पर ,
   कुछ मशालें दहती हैं .



Monday, 17 September 2012

कुछ तो बोलो , चुप क्यों रहते ?

कुछ तो बोलो ,
चुप क्यों रहते ?
चलने पर पैरों के
नीचे आती जैसे ,
चरमर-चरमर ,
रेत बोलती ,
वैसे बोलो तो
कुछ मैं पावन जानूं .

आँखों में अश्रु ,
लिए हुए तुम ,
दबे जा रहे ,
पीडाओं का
लिये पहाड़ ,
चुपके-चुपके ,
जोर लगा कर
बाहर आना ,
जैसे धरती में
दबे बीज का ,
अंकुवा बन कर ,
बाहर आना.
तुम भी
बाहर आओ तो
कुछ मैं पावन जानूं .

वो आते हैं ,
अभिनेता से ,
अभिनय करते ,
अपने बनते.
कुछ विश्वास,
और -
दिलासा देकर ,
तेरी झोली में ,
हाथ डाल कर ,
जो भी मिलता ,
ले कर वो तो ,
चलते बनते.
तू है कि बस ,
लुट जाने का ,
रोना रोता ,
पता नहीं क्यों ,
रक्त तेरा है ,
इतना शीतल ,
चूल्हे पर चढ़ी ,
दुग्ध-भगोनी ,
जैसे उफने तो ,
कुछ मैं पावन जानूं.

Saturday, 15 September 2012

सुन्दर व्यवस्था रहे , दृढ प्रबंधन रहे ,
              पर स्वजन ही सदा ,गुह्य छिद्र देखते .
नवीन विकास हेतु , क्षिप्रगति चाही गयी ,
              पर स्वजन ही सदा , राह-शैल बनते .
प्रगति में बाधक जो , मूल से हटाने होते ,
              पर स्वजन ही सदा , आलोचक रहते .
सत्ता और शासन का , अधिकार गुरु देते ,
              पर स्वजन ही सदा ,  घातक से रहते .





Friday, 14 September 2012

तेज-बल-शील लिए , राम का विराट रूप ,
                अरि जन के समक्ष , पूर्ण काल रूप है .
लेकर विकट धनु , करते संधान जब ,
                छोड़े गए तेज बाण , पूर्ण नाग रूप हैं .
यमदंड के समान , चलते तो रुके नहीं ,
                श्वांसों के शशक हेतु , दृढ पाश रूप है .
तात दशानन अब , अहंकार छोड़ कर ,
                सती सीता सोंप दें  , भगवान-रूप हैं .

जानकी प्रसन्न होगी , राघव प्रसन्न होंगे ,
                सीता-राम युगल से , क्षमा मांग लीजिए .
हो कर विनम्र आप , राम के समक्ष आप ,
                 उचित उपहार दे  ,  वय  मांग  लीजिए .
स्वर्ण मणि रजत से , वस्त्र और भूषण से ,
                 राघव को मान दे के ,  कृपा मांग लीजिए .
उमापति देख रहे , राम की लीलाएं सब ,
                 राम  करुणावतार ,  दया  मांग  लीजिए .

रावण उखड कर , कह पड़ा सभा मध्य .
                 अधम निशाचर हो , कटु वाणी रोक लें .
वर्ण के विरुद्ध हो के , करते प्रलाप अद्य ,
                 शठ निशाचर हए  , अरि भाव रोक लें .
नृप का विरोध किया , शासन विरोध किया , 
                 दंड अनुमान कर , राज - द्रोह रोक लें .
व्यवस्था विरोध करो  , गति अवरुद्ध करो ,
                 विभीषण सह्य नहीं , काल - दंड रोक लें .

Wednesday, 12 September 2012

इन्द्रजीत कथन से , विभीषण रुष्ट हुए ,
               तर्जनी वे तान कहे , अभी आप बाल हैं .
तात सम पद मम , भूल गए कौन हूँ मैं ,
               बल के प्रभाव में ही , मद - भरे भाव हैं .
भूल गये सदाचार , ओढ़ लिए कदाचार ,
               आचरण विहीन हैं , तुच्छ  व्यवहार हैं .
साधारण नर नहीं , राम और लक्ष्मण हैं ,
               सुग्रीव के सह मानो , दहते वे ज्वाल हैं . 

कहने को इन्द्रजीत , रावण तनय तुम ,
                रावण  तनय  कहाँ , अरि सम लगते .
रक्ष-वृन्द के कथन , नृप के विनाश हेतु ,
                पुष्ट किये जा रहे हो , बोध हीन लगते .
नृप भ्रष्ट करने में , सहायक लगे हुए ,
                बलहीन  नृप  चाहे , अंध  सम लगते . 
नृप को उचित राह , नहीं दिखलाते सब ,
                अंधकूप  में  धकेले , तुम  सह  लगते . 

सुनो अब इन्द्रजीत , तुम सब रक्ष वीर ,
                भूपति में  भ्रम भर , अहित  ही करते .
निजता के हेतु सब , स्वेच्छाचार करते हो ,
                रक्ष  और रक्ष-नृप , व्यसन  ही करते  .
राम सदा सत्य सह , विराट व्यक्तित्त्व वह ,
                राजन को अग्र कर , निजता ही करते .
अतल-वितल तक , राम-शर गूंजते हैं ,
                संधान तुम्हारी ओर , राघव ही करते .



Monday, 10 September 2012




विभीषण के सम्मुख  , इन्द्रजीत कह पड़ा , 
                   कहने से पूर्व तात , विचार तो कीजिए . 
आप रक्ष वंश के ही , रक्ष वंश आप का ही ,
                   रक्ष वृत्ति के विरुद्ध , भाषण न कीजिए .
नृप श्रेष्ठ रावण के , अनुज ही बने रहें ,
                   उन की कृपा से आप , सुख से विचरिए.
आप सम भीरु कोई , नहीं रक्ष बाल तक .
                   भय अति सालता  तो , बाल-संग रहिए . 

इन्द्रजीत कथन से , निशाचर हर्ष भरे ,
                  नृप मन मोद भरे , कहता "उचित"  है .
रावण सम्मुख हो के , कहता है वह वीर ,
                  राम  युद्ध चाहते हैं , युद्ध  ही  उचित है . 
निशाचर अतुलित  , बल और वीरता में,
                 अन्य का विरुद गाये  , रोकना उचित है .
मम शर अनुगूंज , आज तक गूंजती है ,
                  देवराज  युद्ध - कथा , कहना  उचित  है . 

देवराज इन्द्र को भी , युद्ध में पकड़ लाये ,
                  स्वर्गपति धरा पर , बंदी वो हमारे थे .
भयंकर युद्ध हुआ  , देव पलायन हुआ ,
                  पूर्ण स्वर्ग रिक्त हुआ , घोष ही हमारे थे .
गजराज एरावत , श्वेत दन्त खो कर के ,
                  धरा पर लाया गया , कौशल हमारे थे .
अमरों की नहीं चली , कब नर की चलेगी ,
                  तात  तुम देख आओ , शौर्य जो हमारे थे .

Saturday, 8 September 2012

विभीषण द्वारा प्रहस्त को फटकार-

वाहिनी का आगमन , चिंता का विषय है ,
                 वाहिनी जो चढ़ आई ,कारण को खोजिए .
सीता का हरण किया , रामदूत रिक्त गया ,
                 रामाज्ञा अवहेलना , कारण  को  मानिए .
कार्य के निरोध  हेतु , कारण निरोध करें ,
                 सीता सौंप क्षमा मांगे , भय मुक्त होइए  .
युद्ध कोई हल नहीं , विवाद उचित नहीं ,
                 राघव  अतुल्य  वीर , कौतुक न जानिए .

भीषण प्रहस्त रक्ष ,सरोष वो बोल पड़ा,
                 हम सब यहाँ बैठे , संशय क्यों पालते ? 
नर नाग किन्नर हो , छलि-बलि देव चाहे,
                 दधि सम मथ दिए , ये भी मथ डालते .
अगणित वीर यहाँ , इन्द्रजीत वीर यहाँ ,
                 रावण सा नृप यहाँ , राम को न जानते .
विभीषण आप जैसा , भयभीत नहीं कोई ,
                 रावण अनुज हो के , भय - भ्रम पालते . 

अनुचित कथन से , विभीषण चीख पड़े , 
                 गंभीर गुहा से जैसे , केसरी गरजता .
तुम जैसे ही प्रहस्त , पार्षद भरे हुए हैं ,
                 आत्ममुग्ध रहे सदा , नृप भी बहलता .
विनय स्वभाव मेरा , पानी की तरह मानो ,
                 पानी सदा उग्र होता , लेकर तरलता .
राम सम तुम नहीं , तुम सम राम नहीं ,
                 राम-धनु प्रत्यंचा से , त्रैलोक्य दहलता . 


आत्ममुग्धता से रक्ष , स्वेच्छाचारी हो गए हैं ,
                  मर्यादित कर्म नहीं , तार-तार सत्य है .
मार दिया सृजन को , पाल लिया विध्वंस को ,
                   हरण-दलन मुख्य , तार-तार मूल्य है,
मन के ही क्रीत रहे , भोग में ही लीन रहे ,
                  संविधान सोया रहा , तार-तार तन्त्र है .
स्वार्थ यहां मुख्य बना, परमार्थ गौण बना ,
                   दिशाहीन मंत्रणा है , तार-तार मन्त्र है .


Friday, 7 September 2012

सर्व हित चाहता हूँ , देता परमार्थ हूँ .

प्रभु नम्र निवेदन , आप के समक्ष है ,
                सत्य यह रक्ष-राज , लंका अपराधी है .
सीता हरी हुई आई , विपदा भी साथ आई ,
                वानर ने आ कर के , उधम मचाई है .
वीर कई मारे गए , हाथ से तनय गया ,
                तुस सम फूँक कर , लंका को जलाई है .
रामदूत लौट गया , सीता सहिदानी सह ,
                राम ने सीता के हेतु , वाहिनी चढ़ाई है . 

विभीषण कथन से , लंकापति काँप गया ,
                उदधि लहर मानो , काट गयी कूल को .
हो कर के सरोष वो , अनुज पे चढ़ कहे ,
                समझ में आता मुझे , तुम प्रतिकूल हो .
लंकेश के छत्र तले , नित प्राण धरते हो ,
                दृष्टिहीन  हो  कर के , कर  रहे  भूल हो .
विमुख हो कर बंधु  , मृत्यु ही बुलाते हो ,
                मंत्रणा स्वीकार वही , मम अनुकूल हो .

विभीषण हाथ जोड़ , सभा मध्य कह चले ,
                कृपा कर सुन लें जो , कहता हितार्थ हूँ.
प्रतिकूल न मानिए , वो अनुकूल जानिए ,
                राज अधिकारी भी हूँ , कहता धर्मार्थ हूँ .
प्रभु के ही छत्र तले , प्राण नित पुष्ट करूँ ,
                छत्र  यह  पूर्ण  रहे , गूढ़  चिंतनार्थ  हूँ .
आगत ये मित्र कहे , मंत्रणा उचित पर ,
                सर्व  हित  चाहता  हूँ , पाता  परमार्थ हूँ .











Tuesday, 4 September 2012


मेरा ईश्वर मेरा प्रियतम ,
कैसे कह दूं वह कैसा है?
जो मैनें जाना .

वह है तेरे जैसा ,वह मेरे जैसा ,
है उस के जैसा , इस के जैसा .
सच तो यह है ,
कुछ-कुछ है वह सब के जैसा ,
कैसे लिख दूं वह कैसा दिखता ?
जो मैंने जाना.

सुमनों की सुरभि सा लगता ,
जल की शीतलता सा लगता ,
आग सरीखा,
पानी की चिलमन जैसा लगता ,
कैसे चित्र रचूं वह कैसा लगता ?
जो मैनें पाया .

सब ओर मुखर है उस की दृष्टि
जड़-चेतन है सब उस की सृष्टि,
गूँज उठी है ,
अन्दर-बाहर उसकी अभिव्यक्ति ,
कैसे कह दूं वह कैसा मिलता ?
जो मैनें गाया .

Sunday, 2 September 2012

बढ़ गये क्या ?



रेत में चलते हुए तुम ,
       थक गये क्या ?
रेत के विकृत चरण में,
       झुक गये क्या ?

शुष्क दानव नित धधक कर ,
          घूरता है,
छाँव - पानी की जगह बस,
          क्रूरता है,
मध्य इस के खेजड़ी आदर्श है ,
           हंस रही है ,
       बंट गये क्या ?

ठंडी हवाओं को जला कर ,
         ज्वाल करता ,
धूल - धक्कड़ को उड़ा कर ,
          भाल धरता ,
अवसाद का अजगर भयावह ,
           लीलता है,
        चुक गये क्या ?

इस छोर से उस छोर पसरा ,
         पत्थरों सा मौन है,
फैलती है निर्गुणी सी रिक्तता,
          परिचित  कौन है,
गीत अलगोजा यहाँ पे गा रहा,
             प्राण तेरे,
          जम गये क्या ?

सांप बिच्छु और कर्कट रेंगते हैं ,
             मानता हूँ ,
गिद्ध चीलें और कौए उड़ रहे हैं ,
             जानता हूँ ,
प्राण ने संघर्ष कर के है संजोयी,
              संजीवनी,
           जग गये क्या ?

एक  बच्चा  हाथ  लहरा  कर तुम्हें ,
             पुकारता है ,
 रेत पर जो सर्जना की वह दिखाना ,
              चाहता है,
लोग वो ही याद रहते जो बो चले हैं ,
              जिजीविषा,
             बढ़ गये क्या ?