Monday, 30 July 2012

बादल तुम हो महाकाल .


बादल बरसे गरज -गरज के,
यही समय की मांग उठी ,
बादल तुम हो महाकाल  .

अब नन्हें पौधे सूख गये ,
हरित धरा भी पीत हुई .
दूर -दूर तक भरी निराशा ,
लो सृष्टि सारी क्षीण हुई.

सृष्टि विकसे लरज-लरज के ,
यही धरा की चाह उठी ,
बादल तुम हो महाकाल .

बादल तेरा है प्रथम रूप ,
सच मानो वह है ब्रह्म-रूप ,
तरल वृष्टि का वर्षण कर ,
धरो-धरो तुम  रचन-रूप .

सृजन करो चहक-चहक के ,
ले कर धरती-ब्रह्माणी ,
बादल तुम हो महाकाल .

नव अंकुरण फिर से फूटें,
नन्हें पौधे फिर से झूमे ,
पुष्ट-पीन शाखाओं पर ,
फिर से कोमल कोंपल झूले .

नव-नव सृजन प्राण संवाहक ,
इसीलिए तुम प्राणाधार ,
बादल तुम हो महाकाल .

रूद्र-रूप भी तुम हो आओ ,
डम-डम डमरू नाद सुनाओ,
बड़े वेग की धार बहा कर ,
जीर्ण-शीर्ण अविलम्ब हटाओ .

अब धरती गौरी-रूप चाहती ,
असम्यक का करो संहार ,
बादल तुम हो महाकाल .

नव सृष्टि का पालन करने  ,
लेना ही होगा पालक-रूप ,
सरसे-.विकसे यह नव सृष्टि ,
सच पूछो तो विष्णु-रूप .

दयित भाव से बरसो-बरसो ,
मान लिया है पालनहार,
बादल तुम हो महाकाल .

आज धरा को फिर से वर लें ,
मंगल कुमकुम इसमें भर दें ,
अब अचला चपला सी कर दे.
नए सृजन की शक्ति भर दें ,

जड़ता के बंधन काट-काट ,
स्वीकार करें अब सृजनभार ,
बादल तुम हो महाकाल .

Thursday, 26 July 2012


किया भरोसा राम का , राम नाम विश्वास  .
कालजयी हो कर चले , बाबा  तुलसीदास.

नहीं जननी का सुख मिला ,
नहीं जनक की छाँव .
मंदिर ही उनका घर बना ,
मंदिर ही उनका गाँव .

राम नाम के बोल से  , गई भूख औ प्यास .
कालजयी हो कर चले , बाबा  तुलसीदास.

वेद - पुराण का पाठ किया   ,
लिया ब्रह्म का ज्ञान .
मधुकरी से तन पल रहा  ,
मन पाये गुरु ज्ञान .

संतों के अभिषेक किये , ढोंगी के उपहास.
कालजयी हो कर चले , बाबा  तुलसीदास.

राम नाम लिये चल पड़े ,
सारे गढ़ लिये जीत .
अगुण-सगुण को एक कर ,
माया की भांजी रीत .

राम नाम से मौज की  , जग में रहे उदास .
कालजयी हो कर चले , बाबा  तुलसीदास.





Sunday, 22 July 2012

तेरे ही जूड़े ,फूल गूंथना , घर पर आना.


हमें देख कर मुस्काते हो , घर पर आना .
चाय पियेंगे , बात करेंगे , घर पर आना.

गुड़हल की शाखाओं पर ,
लकदक हो कर फूल झूलते .
लाज सरीखे उन फूलों से ,
मधुकर आ कर भाव पूछते .

तेरे ही जूड़े ,फूल गूंथना , घर पर आना.
चाय पियेंगे ,बात करेंगे , घर पर आना.

बरसाती मेघों को लेकर ,
गीले-गीले गीत लिखे हैं .
सूत्र सरीखे कच्चे रिश्ते ,
उन गीतों में खूब जिये हैं .

दुर्वा पर बैठे ,गीत पढेंगे , घर पर आना.
चाय पियेंगे ,बात करेंगे , घर पर आना.

बहुत सहेज के रखे  हुए है,
वो तेरे - मेरे निर्मल बचपन .
फटी पुस्तकें जीर्ण खिलौने ,
अब भी कहते अपनी अनबन .

चलो सुलह , करने बैठें ,  घर पर आना.
चाय पियेंगे , बात करेंगे , घर पर आना.


Saturday, 21 July 2012

ये सूरत दिखती , कई दिनों से .


बगिया महकी  , कई दिनों से .
कलियाँ चटकी , कई दिनों से.


तुझे देख कर ,
मौसम बदला .
नीड़ में दुबका , 
पंछी  मचला .


गौरैया चहकी , कई दिनों से .
ले आई तिनके ,कई दिनों से .



लगी अर्गला ,
उतर चली है .
झीनी झिल्ली ,
खिसक चली है.


खिड़की खुलती , कई दिनों से .
ये सूरत दिखती , कई दिनों से .


फिर से काली ,
कलम दौड़ती .
धवल अर्थ से ,
शब्द जोड़ती .


कविता रच दी  , कई दिनों से .
तुम जो मिलती , कई दिनों से .







Thursday, 19 July 2012

रावण की सभा में विभीषण का पहुँचना-

कोई वीर ओज भर , सभा मध्य उठ कहे ,
                     नृप आप निश्चिंत हो , वारुणी को पीजिए .
अभी इसी काल जाऊं , दोनों भ्राता मार आऊं ,
                     सहज  है  मेरे  लिए , कौशल को  देखिए .
अन्य वीर क्रोध भर , तीक्ष्ण शस्त्र धर कहे,
                     राम वाहिनी को अब , दण्डित ही मानिए .
लक्ष्मण सुग्रीव सह , राम का दमन करूँ ,
                     वाहिनी  चर्वण  करूँ  , सुख कर सोइए .

इसी मध्य वीरमणि , विभीषण आ कर के ,
                     रावण-सम्मान किया ,उचित प्रणाम से .
ऊर्ध्व हस्त तान कर , नृप जयघोष कर ,
                     रावण-प्रसन्न किया , उचित सम्मान से .
नृप मन मोद भर , आसन संकेत किया ,
                     अनुज ने आसन को , लिया व्यवहार से .
रावण भी अनुज को , देख रहा एक दृष्टि ,
                     मिलन वो चाहे मानो , अनुज विचार से .

आसन को पा कर के , बैठ गए विभीषण ,
                     तन से अचल लगे , सचल अन्तर था .
रावण अनुज देखे , अनुज रावण देखे ,
                     रावण सभा के मध्य , मोन ही प्रमुख था .
देख कर विभीषण , रक्ष वर चुप हुए ,
                     जैसे छिपे तारागण , रवि का प्रहर था .
उचित समय जान , विभीषण बोल पड़े ,
                     वाणी तो सरल रही , संवाद प्रखर था .

Thursday, 12 July 2012

ऐसा होगा सोचा भी नहीं .



जाते हुए मुड़ के देखे भी नहीं वे , ऐसा  होगा सोचा भी नहीं  .
गीला कर  देंगे मौसम को भी वे , ऐसा होगा सोचा भी नहों .

गीतों-गजलों में उन को मढ़ दूं , जैसे है वो कंचन का पानी .
पहले ही फिसल गये हाथों से वे ,ऐसा होगा सोचा भी नहीं .

कल तक तो चर्चा थी मेरे हैं वे , ऐसा सब लोग कहा करते .
आज हुए हैं हवा के झोंके  से वे , ऐसा होगा सोचा भी नहीं .

कल तक सांसों  के  सरगम थे , देख कर जी लिया करते थे .
सधे हुए तारों  को  तोड़ चले हैं वे ,ऐसा होगा सोचा भी नहीं .

परछाई बन-बन कर के वे , कभी प्यार की बौछारें करते थे .
मेरा ही जनाजा उठाने आते हैं वे , ऐसा होगा सोचा भी नहीं.

Tuesday, 10 July 2012

जरा हँस के दिखाइए .



उदासियाँ बहुत खलती हैं , जरा हँस के दिखाइए  .
इसी बहाने यहाँ फूलों को , मुस्कराने भी दीजिए  .

गलतियां हुई है बहुत ही,
कभी हम से ,कभी तुम से .
कोशिश भी हुई मनाने की,
कभी तुम से ,कभी हम से .

मौसम यूं ही न बीत जाए , इस रुत को सजाइए  .
इसी बहाने यहाँ फूलों को  , मुस्कराने भी दीजिए  .


चुपके -चुपके पढ़ते होंगे ,
तुम हमारे दिये ख़त को .
पढ़-पढ़ के भिगोते होंगे,
तुम हमारे दिये ख़त को .

ख़त में लिखी हमारी बातें , अब यूं ही न बहाइए  .
इसी बहाने यहाँ फूलों को , मुस्कराने भी दीजिए  .


छेड़ दी है जीवन की सितार ,
तेरे - मेरे सरगम सजाने को .
बहाया है जीवन का झरना ,
तपिश में यहाँ भीग जाने को.

हम-तुम जले दूर रह कर , अब बाहों में समाइए .
इसी बहाने यहाँ फूलों को  ,मुस्कराने भी दीजिए .


Friday, 6 July 2012

चुपके से कोई....

चुपके से कोई ,
मुझ को जगा गया।
मेरी निंदिया ही ,
मुझ से चुरा गया।


घायल पंछी सा अब फिरता हूँ इधर-उधर ,
तब से ही खोज रहा हूँ उस को इधर-उधर .
मैं अपने में समझा बन कर के ही रहता हूँ ,
वो पगला कहते लोग मुझे बस इधर-उधर ।


चुपके से कोई ,
मुझ को हिला गया।.
मेरी निंदिया ही ,
मुझ से चुरा गया।


गीतों में गाता हूँ उस नटखट को यहाँ-वहाँ ,
छंदों में रचता हूँ उस अनुभव को यहाँ-वहाँ .
घायल की गति को घायल जाने यहाँ-वहाँ,
मैं जाग रहा हूँ पर दुनिया सोती यहाँ-वहाँ ।


चुपके  से कोई ,
मुझ को बींध गया।
मेरी निंदिया ही,
मुझ से चुरा गया।


कभी रज-कण में वो अनुभव होता जाता है ,
विस्मित कलियों में अनुभव होता जाता है .
अनुभव होता  शिशु की शुचि किलकारी में,
विदग्ध ममता में वो अनुभव होता जाता है।


चुपके  से कोई ,
मुझ को रुला गया।
मेरी निंदिया ही,
मुझ  से चुरा गया।

वह पवन चला कर ,नित आंसू पोंछा करता ,
वह रिमझिम बौछारों से भी बहलाया करता .
श्याह रात में आँख मिचौनी भी खेला करता ,
दूर देश से लगा पुकारें वह  उकसाया करता ।


चुपके  से  कोई ,
मुझ को मोह गया।
मेरी निंदिया ही , 
मुझ  से चुरा गया।

कई रूप में एक वही तो मेरा प्रियतम ही है,
हाँ-हाँ मेरा वह ही तो नटखट प्रियतम ही है .
चाहे जैसे वो खेले मैं तो एक खिलौना ही हूँ ,
अन्दर - बाहर एक वही मेरा प्रियतम ही है।


चुपके से  कोई ,
मुझ को बता गया।
मेरी निंदिया ही,
मुझ  से चुरा गया।

Wednesday, 4 July 2012

आ कर के छू ले दो बूंदे बारिस की .



आ कर के छू ले दो बूंदे बारिस की .
घुटन समझ ले दो बूंदे बारिस की .

यहाँ-वहाँ भटकते प्यासे सब कोई .
प्यास बुझा जाए दो बूंदे बारिस की .

इक अर्से से मुंह फैरे बैठे  वे हमसे .
समझा दे आ के दो बूंदे बारिस की .

कितनी दस्तक दी है उन के ही द्वारे.
खुलवा दे दरवाजा दो बूंदे बारिस की .

अब घायल पंछी से हम तड़फ रहे हैं.
खुले हुए मुंह आए दो बूंदे बारिस की .

वे चुपके - चुपके हंसते मेरी हालत पे .
वो कटार सी लगती दो बूंदे बारिस की .

सरे राह धोखा खाया है  उन से यारों .
इश्तहार सी कह दे दो बूंदे बारिस की .


Monday, 2 July 2012


एक तूफान उठा ,
और,
समंदर खंगाल गया .
बहुत उठा-पटक हुई,
समंदर के  पानी में ,
लेकिन,
एक बात सही हुई ,
मोती सा पानी रह गया ,
और ,
कचरा किनारा ही छोड़ गया.