Friday, 22 June 2012

जल की करे तलाश .




मधुरा गौरी खाली घट ले, जल की करे तलाश .
रंग कुसुम्भी रखने वाला , सूख गया रे पलाश .


सूख गए हैं ताल-तलैया , 
फटी बिवाई  सी  धरती .
किसना हाथ धरे बैठा है ,
क्यों  नहीं  मेह बरसती .


सूखे - सूखे दिन सब बीते ,वर्षा भी करे निराश . 
मधुरा गौरी खाली घट ले, जल की करे तलाश .


तपती धरती बिजली गुल ,
अब पवन लगे अंगार सा .
सो योजन सा दिन लगता,
अब मोल नहीं  श्रृंगार का.


नृप इंद्र करे बहुत मनमानी , क्या जाने वह प्यास . 
मधुरा  गौरी  खाली  घट ले , जल  की  करे तलास .


नित्य नया उद्घोषक बोले ,
गरज के वर्षा होगी आज.
कहीं पर छींटे तेज  गिरेंगे,
कहीं  गिरेगी  भारी गाज .


पर नहीं देखता चौकी पर ,खाली धरा गिलास.
मधुरा गौरी खाली घट ले, जल की करे तलाश .


शुष्क शाख पर बैठे-बैठे,
अब सब गें-गें करे मयूर ,
शायद धैर्य बंधाते कहते,
अब आयेंगे जलद जरूर .


रंग कुसुम्भी भर जाएगा , सज जाएगा पलाश .
मधुरा गौरी खाली घट ले, जल  की करे तलाश .  

Tuesday, 19 June 2012

चाहता परिवर्तन यहाँ पर

स्वप्न बुनता एक क्षण में ,
वह टूटता भी एक क्षण में ,
क्या कहूं  उस त्रासदी को ,
भोगता हूँ हर एक क्षण में .

सोचता हूँ उस पार जाऊं ,
पार जा के चुप बैठ जाऊं ,
सब घटित को भूल जाऊं
खीच चादर सो ही जाऊं ,
पैर फिर-फिर खींच लेता,
बोध दहता एक क्षण में .
क्या कहूं ....................

हताशा को छोड़ कर मैं  ,
अभावों को पाट कर मैं  ,
थके साथी खींच कर मैं ,
चला प्राण सींच कर मैं .
फिर देखता हूँ वे वहीँ हैं ,
सिहर जाता एक क्षण में .
क्या कहूं ....................

घाव सब के रिस रहे हैं ,
चील - कौवे  घिर रहे है,
सियारों की मौज चलती ,
श्वान खुल के फिर रहे हैं .
प्रतिरोध के अंकुवे नहीं हैं,
सर पीट लेता एक क्षण में.
क्या कहूं ....................

राम आये  इन के लिए ही ,
कृष्ण आये इन के लिए ही ,
बुद्ध आकर चल भी दिए है,
गाँधी मरे हैं इन के लिए ही ,
दीपक सिराते देख सब को ,
व्यग्र होता उस एक क्षण में 
क्या कहूं ....................


मैं कलम को घिस रहा हूँ ,
तीक्ष्ण इसको कर रहा हूँ,
लहू की स्याही बना कर ,
अग्नि-गान को रच रहा हूँ .
चाहता परिवर्तन यहाँ पर ,
एक युग या एक क्षण में .
क्या कहूं .....................
 

Wednesday, 13 June 2012

प्यार के सफर में




प्यार के सफर में,
विश्वास की डगर में , 
तुम मुझ को मिले, 
मेरे लिए यह काफी है . 
मैं न मंदिर गया 
न मैं मस्जिद गया ,
मैं न गिरजे गया , 
न मैं गुरुद्वारे गया .
तुम मुझ को मिले ,
देव सारे मिले ,
मेरे लिए यह काफी है. 
प्यार के......................

मैं न गंगा नहाया , 

न मैं यमुना नहाया ,
मैं न कृष्णा नहाया , 
न मैं कावेरी नहाया .
तुम मुझ को दिखे , 
अभिषेक सारे हुए ,
मेरे लिए यह काफी है .
प्यार के......................

मैं न गोकुल गया , 

न वृन्दावन को गया, 
मैं न काशी गया ,
न मैं गया को गया .
तुम मेरे हुए , 
तीर्थ सारे हुए ,
मेरे लिए काफी है .
प्यार के......................

मैं द्वारे तुम्हारे ,

दस्तक देता रहा, 
तुम रूठे रहे ,
मैं मनाता रहा.

तुम हंस के चल दिए ,
हम हलके हो गये ,
मेरे लिए यह काफी है. 
प्यार के......................

Sunday, 10 June 2012

तुम अम्मा सी लगती हो .

पूर्ण  वेग से बह कर नदिया,
गीत सृजन का गाती हो,
सुनो नदी मैं सच कहता हूँ -
तुम अम्मा सी लगती हो .


शस्य-श्यामला धरती सजती,
तेरे क्षीण किनारों पर ,
बस्ती पूरी बस जाती है ,
तेरे सरस किनारों पर .
रजत किनारी के अंचल में,
सुनो नदी मैं सच कहता हूँ -
तुम अम्मा सी लगती हो .


तेरे आकर्षण में बंध सब  ,
धारा में अटखेली करते  ,
पतवार फैलाई नौका लेकर,
तरल वक्ष पर क्रीडा करते ,
कोमल स्मित लघु उर्मी में,
सुनो नदी मैं सच कहता हूँ -
तुम अम्मा सी लगती हो .


संध्या-वंदन , ध्यान-धारणा ,
सूर्योदय से सूर्योदय तक चलते हैं ,
योगी-भोगी , सड़े-गले शव ,
सूर्योदय से सूर्योदय तक बहते हैं ,
शान्त प्रमन सी धारा में ,
सुनो नदी मैं सच कहता हूँ -
तुम अम्मा सी लगती हो .


भव्य-भवन की निर्मिति पर ,
पाँव पखारे जाते तुझ पर ,
भौतिकता के अर्चन में जब,
पाँव पसारे जाते तुझ पर ,
क्रुद्ध धार के तीव्र प्रवाह में,
सुनो नदी मैं सच कहता हूँ -
तुम अम्मा सी लगती हो .


कूल-कगारों का लंघन कर,
बस्ती में भर जाती हो ,
अवरोधों को तोड़-फोड़ कर,
धारा में पिस जाती हो ,
धारा के मटमैले रंग में,
सुनो नदी मैं सच कहता हूँ -
तुम अम्मा सी लगती हो .


मैदानों में खूब फैल कर ,
सरल -विरल हो जाती हो ,
मंथर गति में आगत सिक्ता  ,
धीरे से रख जाती हो ,
नये द्वीप के नव -सृजन में ,
सुनो नदी मैं सच कहता हूँ -
तुम अम्मा सी लगती हो .

Tuesday, 5 June 2012

अपनों में तू रह रहा ,



अपनों  में  तू  रह रहा , नहीं हार वा जीत.
वहां जीत में  हार  है , और हार में जीत.

हार देख कर जन कहें , कमियाँ  बारम्बार.
बीच निठल्ला बैठ के , अवगुण कहे हजार.

प्रेम समर के चालते , चितवन  करे  प्रहार .
मन के हाथों हार के , तय करती अभिसार.

आज जीत की चाह में , खूब  किया  श्रृंगार .
प्रिय को आता देख के , भूली चली जय-हार.

हार - जीत के कूल में , जीवन धार प्रवाह .
हार  जीत को चाहती ,  जीत  भरे उत्साह .