Saturday, 29 December 2012

वह सोयी है .


     मत बतियाओ ,
चुप-चुप-चुप-चुप-चुप
       वह सोयी है .

       पूरे पखवाड़े ,
  वह तड़प-तड़प कर,
जैसे-तैसे श्वासें ले कर,
        मछली जैसे ,
     मचल-मचल कर ,
अभी-अभी वह शांत हुई है,
      शायद सोती है ,
तुम से विनती एक यही है -
      उस को सोने दो,
  चुप-चुप-चुप-चुप-चुप,
         वह सोयी है .

       चेहरा उस का ,
  कितना दर्द भोग कर,
देखो कैसा म्लान हुआ है,
      जैसे रक्त कमल,
मदांधगज से नोचा जा कर,
कांतिहीन निष्प्राण हुआ है ,
  उस के घाव बहुत हरे हैं  
        बहुत थकी है
तुम से विनती एक यही है,
      विस्मृत ही रहने दो,
    चुप-चुप-चुप-चुप-चुप,
           वह सोयी है .

          सुनते हो ना ,
मदांधगज की चिंगाडों को,
  वह आवारा दिशाहीन है,
          आज जरूरत,
 मर्यादा और मूल्यों की है ,
देश अभाव से कांतिहीन है,
  उस की देह उधड़ गयी है,
          बहुत डरी है,
तुम से विनती एक यही है,
    ओढ़ दुशाला सोने दो ,
   चुप-चुप-चुप-चुप-चुप,
           वह सोयी है .

                                           - त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द .



Thursday, 27 December 2012

ब्रह्म राक्षस


आजकल आदमी ,
डरने लगा है ,
अपने ही प्रतिबिम्ब से ,
क्योंकि -
डरना उस की
आदत सी हो गयी .

डर ?
हाँ , वह डर ,
निकलता है ,
अचानक सा ,
चलती रेल के डिब्बों से ,
बसों और ट्रामों से ,
होटलों और धर्मशालाओं से ,
प्लेटफार्मों से ,
बसों के अड्डों से ,
कभी वह डर निकलता है ,
किसी प्रेत सा ,
अस्पतालों की दवाइयों से ,
या, पढ़ने की पोथियों से .

डर -
पीछा ही नहीं छोड़ता है ,
वह रेंगता हुआ चला आता है ,
घर के अन्दर और बाहर ,
अपनों और परायों के मध्य ,
जबरदस्ती धंसा चला आता है ,
किसी ब्रह्म राक्षस की तरह ,
सहम जाती है,
कमलिनी सी तनवंगी सी देह,
और ,
डर के मारे ,
वह थर-थर कांपती हुई,
सूख जाती है ,
धूप खायी कोंपल की तरह.

डर का यह ब्रह्म राक्षस ,
हमें देख अट्टहास लगाता
हम पर प्रश्न-चिह्न मढ़ता जाता ,
मूल्य पोथियों में है कैद  ,
आत्मा में नहीं करते रास,
इसीलिए आज भी धरातल ,
बहुत लिजलिजा है ,
और ,
इतना घिनौना कि घिन आती है ,
बहुत दुखी हूँ ,
दिल्ली की खबर सुन कर,
मेरा संध्या-वंदन ,
व्यर्थ हुआ चला जाता है ,
स्वस्ति वाचन तो बेचारा,
सिर धुन-धुन कर ,
बस  पगलाया ही जाता है.

     - त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

Tuesday, 25 December 2012

अकेलापन ओर अजनबीपन.



उसे शिकायत है,
अपने अकेलेपन से ,
और ,
उसे दिक्कत है,
अपने चारों ओर फैले ,
घने कुहरे से,
अजनबीपन से.

कोई नहीं आता ,
उस के पास,
आते और जाते हुए,
कितने सारे लोग .
रुकता कोई नहीं ,
सब के सब
गुजर जाते हैं ,
उस के पार्श्व से .
कभी किसी से ,
मिल जाती है आँख,
नहीं होता कोई भाव,
और ,
कभी नहीं पैदा होता,
अपनत्व भरा सम्प्रेषण .

अपरिचितों का रेला ,
बहता चला जा रहा,
हर एक चेहरे पर ,
अजनबीपन का ,
पुता हुआ,
श्याह काजल .
जिस के कारण ,
सब के सब एक से,
बिम्ब की तरह ,
गुजर जाते हैं .
किसी पानी के ,
बुलबुले की तरह,
बस एक ही परिचय ,
एक सा ही परिचय ,
पानी और बुलबुला ,
आदमी और रेला .

मैं हर बार ,
उस की ओर बढाता हूँ हाथ ,
वो  है कि ,
देखता ही नहीं ,
शायद उकरते हुए ,
हर बिम्ब की तरह ,
मेरे बिम्ब को भी ,
वैसा ही मानता है ,
शायद ,
उस में कोई ग्रंथि सी हिचक,
उसे नहीं करती मुक्त ,
या,
वो ही नहीं पाना चाहता मुक्ति .
इसीलिए बढे हुए हाथ ,
उसे दिखाई नहीं देते,
ओर ,
अपने वृत्त से ,
नहीं आता बाहर ,
ओढ़े रहता है ,
सर्दियों के कम्बल की तरह ,
अकेलापन ओर अजनबीपन.

                 - त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.



Sunday, 23 December 2012

मील के पत्थर


मील के पत्थर ,
हुआ करते थे आदर्श,
आज ,
बीते समय की ,
हो गयी है बात.
मील के पत्थरों को ,
उखड़े हुए ,
और ,
देखा है ओंधे मुंह,
लुढ़कते हुए .

अब कोई पैमाना ,
कहाँ रहा है ,
विश्वसनीय और ,
पूरा प्रामाणिक ,
वे अब बदल गए हैं ,
और ,
अपना आदर्श ,
समय के साथ ,
छोड़ चुके हैं ,
जैसे छोड़ देता है ,
सांप अपनी केचुली,
या,
बढ़ती उम्र के साथ ,
तन छोड़ देता है ,
अपनी मुक्ता सी रवानी .

जरूरत है ,
समय के साथ ,
मील के पत्थरों ,
के बदलाव की ,
नए और प्रामाणिक ,
आदर्श पैमानों के,
ठोस प्रस्ताव की.
इस हेतु ,
कभी नहीं आयेंगे ,
आकाश से आदर्श ,
हमें बनाना होगा ,
या,
फिर से गढ़ना होगा,
आदर्श रूप ,
मील के पत्थर .

जमीन से उखड़े हुए ,
मील के पत्थरों से ,
उचित पैमाने की ,
आशा -प्रत्याशा ,
बिल्कुल है  व्यर्थ ,
फिर क्यों ,
चीख-चिल्लाहट में ,
बाधित होती है गति ,
स्वयं बन सको तो बनो ,
मील के पत्थर ,
और ,
जीवन पुष्ट हो कर
पा सके गति,
ठीक भरी-पूरी ,
नदी की तरह .

     - त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द .

शीत सुहानी .


===========
चढ़ आई है ,
घर की बुढिया सी,
शीत सुहानी .
*******************
लिये रजाई ,
कम्बल ओढ़े आई ,
शीत सुहानी.
*******************
सी सी करती ,
दस्तक देती आई ,
शीत सुहानी .
*******************
मीठा हलुआ ,
गुड-तिल्ली ले आई ,
शीत सुहानी.
*******************
खींच रजाई ,
माँ बोली -"ओढ़ इसे" ,
शीत सुहानी .
*******************
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द .

Saturday, 22 December 2012

बहेगी मधुर पीयूष की धार


सुबह से लेकर सायं तक,
तुम साधते हो निशाना ,
ले कर इच्छाओं की गुलेल ,
और ,
करते रहते हो ,
किसी व्याध की तरह शिकार .

नित्य ही अपनी झोली को ,
भरते हो अपने अभीष्ट से ,
और छोटे से दीपक के तले ,
खोलते हो अपनी झोली ,
टटोलते हो अपनी ,
भयावह उपलब्धियां,
उस समय ,
विस्फारित नयनों से ,
अपनी निर्दयी दृष्टि को ,
फैलाते हो ,
और ,
अपनी अतृप्त तृषा को ,
और अधिक उद्दीप्त करते हो ,
क्योंकि ,
चुल्लू भर खारे पानी से ,
भला किसी की ,
आज दिन तक बुझी है तृषा  ,
जो तुम्हारी भी बुझ सकेगी प्यास  .

तुम्हारी इच्छाओं की गुलेल ,
कब चलना होगी बंद ,
शायद तुम को  नहीं मालूम ,
लेकिन ,
प्यास बुझाने की जग जाए होंश,
तब मेरे पास जरूर आना ,
तब तुम्हें ले चलूँगा ,
बाहर से अन्दर की यात्रा पर ,
और ,
फिर लौटा कर ले आउंगा ,
अन्दर से बाहर की यात्रा पर .

हाँ ,
यही एक विकल्प है ,
तुम्हारी अथक तृषा की शांति का ,
क्योंकि ,
तभी तुम्हारे और अन्य में ,
बैठा हुआ ,
अजदहे सा द्वंद्व होगा समाप्त ,
इच्छाओं की गुलेल होगी चुप,
और ,
बहेगी मधुर पीयूष की धार
तुम्हारी अथक तृषा होगी शांत .

    - त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द .

Friday, 21 December 2012

जिजीविषा के लिए


खोजता हूँ तुम को ,
अन्वेषी की तरह,
शब्द में और अर्थ में ,
रूप में और रंग में ,
गंध और स्पर्श में ,
तुम हो कि ,
कभी पूरे नहीं
मिला करते ,
क्योंकि ,
तुम हर एक संस्थिति में,
थोड़े-थोड़े रूप में,
बदल- बदल कर ,
अभिव्यक्त हो .

मैं तुम्हारे पीछे ,
भागा करता हूँ ,
और,
तुम हो कि ,
मेरे साथ खेलते हो ,
लुका-छिपी का खेल .
आखिर कर तुम ,
मुझे इस तरह से ,
छकाने में,
किस तरह के ,
अहं की पूर्ति ,
अनुभव कर पाते हो .

यदि तुम को ,
इस सब में होती है
कोई संतुष्टि ,
तो यह तुम्हारा,
अकरुण व्यावहार ,
अवश्य निरंतर रहे,
लेकिन ,
तुम दयित भाव से,
किसी अवतार की तरह ,
वरद मुद्रा में आओगे,
तब,
तुम मेरी दृष्टि में ,
श्रद्धा-पात्र नहीं रहोगे .

अस्तु,
तुम इसी तरह से ,
मुझ से दूर-दूर ,
भागते रहो, भागते रहो,
और ,
अन्दर-बाहर,
छिपते-छिपाते रहो,
आँख-मिचौनी खेलते रहो,
और मैं ,
तिल-तिल ही सही ,
तुम को खोजता रहूँगा ,
नित नवीन रूप में,
तुम को पाता रहूँगा,
यह सब तुम्हारे,
ऊंचे कद के लिए ,
और मेरी जिजीविषा के लिए,
बहुत ही जरूरी है ,
जैसे जीवन के लिए ,
हवा पानी और धूप ,
बहुत ही जरूरी है.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द .


Sunday, 16 December 2012

कभी स्वीकार नहीं किया,



तुम ने मुझे ,
कभी स्वीकार नहीं किया,
बस , अपनी इच्छाओं से,
दे दिया रूप-आकार ,
क्षणिक प्यार ,
क्षणिक तिरस्कार.
कब तुम ने सुनी है ,
मेरे कोमल ह्रदय की धड़कनें ,
और कब समझी है , 
मेरी इच्छाओं की दुनिया,
क्योंकि,
तुम्हें अवसर ही नहीं मिला,
अपने से बाहर आने का.

तुम ने कभी जाना है,
तुमसे बाहर भी है ,
एक दुनिया,
जिसे जाने बिना ,
हर कोई है अधूरा ,
मेरी नजर में भी ,
तुम वैसे ही तो हो,
भले ही अपने अहं की ,
सम्पूर्ति में मानते हो ,
अपने को खरा-पूरा,
लेकिन सच यह है -
यह सब बहुत ही 
हास्यास्पद जीवन है,
जो है बिल्कुल आधा-अधूरा .

हमेशा मुझे माना है,
उपभोग की वस्तु ,
जितना उपयोग ,
और जैसा उपभोग ,
उसी अनुसार दिया है दाय ,
कभी स्नेह ,कभी तिरस्कार,
( उस में भी अपनत्व नहीं था )
तुम्हारे हाथों में ,
ताश की गड्डी की तरह रहा,
जी भर कर फेंटते हो,
पत्ते बाँटते हो,
रम्मी बनाने की चाहत में,
दगा भी करते हो,
बन जाती है रम्मी ,
तब चूम जाते हो ,
टूट जाती है रम्मी,
टेबल पर पटक जाते हो ,
यही तुम्हारे चरित्र का सच है .

हर रात तुम्हारी ,
अकेलेपन में गुजरती है ,
दिन अजनबीपन में,
गुजर जाता है ,
इस की वजह मैं नहीं .
एक बार छोड़ के देखो,
पत्तों की तलाश,
इक्का-बादशाह , 
बेगम-गुलाम,
नहला- दहला 
या,
जोकर का झंझाल.
मुझ में खोज के देखो,
अपना बिम्ब-प्रतिबिम्ब,
तब नहीं रहेंगे-
रातों का अकेलापन,
दिन का अजनबीपन.


Thursday, 13 December 2012

यह भी सृजन का एक स्तर .


अपनी ही तलाश ,
बहुत मुश्किल ,
कार्य होता है ,
खड़े  पर्वत की ,
चढ़ाई का जैसे ,
दुष्कर भार होता है.

यह तलाश
नित्य करना,
हमारी नियति जैसा ,
या,
यों मान लें ,
हमारी दिनचर्या की ,
अनुक्रमणिका के
मुख्य चरण जैसा ,
जिस के अथ और इति,
के फैलाव में है ,
परं अर्थ जैसा.

यह तलाश इसलिए कि,
मुझ को मिला है ,
प्रकृति से -
रंग,रूप , आकार ,वर्ण ,
ये सब भिन्न है,
ह्रदय, बुद्धि और चिन्तना,
ये सब भी सभी से भिन्न हैं
और,
भिन्नता ही पहचान है ,
उस ने सजाई है ,
अपनी अल्पना ,
कुछ रंगीन करने के लिए ,
कुछ विस्तार देने के लिए ,
इसीलिए सब के अपने ,
अलग वर्ण और अपने चिह्न हैं.

मैं अलग -थलग सा ,
चल रहा हूँ तो चल रहा हूँ ,
यह बहुत जरूरी है ,
अपनी ही तलाश के लिए.
मिल कर सभी में ,
गड्ड-मड्ड होना ,
सम्यक है नहीं,
इस से तो ,
उस प्रकृति की रचित,
अल्पना बिगड़ ही जायेगी.
मैं अलग रह कर ,
अल्पना का अंश बनना
सम्यक मानता हूँ .
हाँ यह सही है -
मैं पूर्ण अल्पना,
कभी न हो सकूंगा ,
पर इस बात का ,
मुझ में परितोष होगा,
अल्पना को कभी ,
भ्रष्ट तो न कर सकूंगा .

कितना कष्टप्रद होता है,
व्यक्ति भूल जाए अपनी तलाश ,
या ,
भीड़ में खो जाए भीड़ बन कर ,
जैसे किसी काव्य-संकलन में ,
किसी छोटी कविता का ,
संकलन के बोझ में ही ,
दबे रहना और कुचलना ,
यह बहुत त्रासद,बहुत त्रासद
या,
हांशिये पर चले जाना
यह बहुत भयावह,बहुत भयावह.

सच,
अस्तित्व की तलाश ,
बहुत मधुर है, बहुत मधुर है,
तलाश के लिए जीना,
सहज तो है नहीं ,
पर,
बहुत मधुर है, बहुत मधुर है,
यह भी सृजन का एक स्तर .

तलाश .


भीड़ के रेले में ,
एक चेहरा खोजना ,
बहुत मुश्किल होता है ,
जैसे भूसे के ढेर में,
सूई का खोजना.

कितने सारे चेहरे,
आते -जाते चेहरे ,
उठते-गिरते चेहरे,
श्यामल-उज्ज्वल चेहरे,
खुले-खुले चेहरे ,
मुखौटे चढ़ाये चेहरे ,
कैसे-कैसे चेहरे ,
इतने सब में से ,
अपनी ही तलाश ,
बहुत मुश्किल होती है,
चेहरा ?
हाँ , वह चेहरा,
जिस को पा कर लगे ,
हाँ ,इसी की थी चाह ,
इसी की थी तलाश .

इसी खोज के सिलसिले में ,
कई बार खुद को ही ,
गुम होता पाते हैं,
तब उस भीड़ में ,
स्वयं से स्वयं की तलाश ,
कितनी होती है त्रासद,
तब उस चलती हुई ,
भीड़ में से ,
किसी एक को देख
बुदबुदाते हैं -
अरे ! मैं तो इस के जैसा ,
यह बोध ,
बहुत त्रासद , बहुत त्रासद .

चाहता हूँ इस भीड़ में,
मेरा भी अस्तित्व,
मेरी भी अक्षुण पहचान ,
चाहता हूँ स्वयं को ,
करना पूर्ण अभिव्यक्त,
इसीलिए तो चाहता हूँ ,
इस भीड़ में मुझ को मिले ,
अलग चेहरा ,
अलग पहचान
जो मुझ को बता सके -
इस भीड़ से मैं हूँ ,
एक अलग व्यक्तित्व ,
तब वह बहुत ही ,
सुखद होगा, सुखद होगा.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द .

Wednesday, 12 December 2012

घर भी ऐसा .


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शोर मचाती ,
है रेल फिसलती,
घर भी ऐसा .
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आगे ईंजन ,
खींच रहा है बोगी,
घर के जैसा.
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ठांव-ठांव ले ,
रेल दौड़ लगाती ,
घर भी देखा.
*****************
पटरी है तो,
नित रेल चलेगी,
घर भी वैसा .
*****************
टूटी पटरी ,
ईंजन है छिटका ,
घर ही टूटा .
*****************
ईंजन-बोगी ,
लग रेल बना है ,
घर भी माने .
*****************
चलती रेल ,
चलती है पटरी,
घर भी जानें .

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

Sunday, 9 December 2012

रेत से दिन.


कोयल कूकी,
गहराती अमिया ,
सुख के दिन ,
धीरे से रीत चले ,
रेत से दिन.

मैना चुप है  ,
झरती है अमिया ,
दुःख के दिन ,
लम्बे होते जाते हैं ,
छाँव से दिन.

चिड़िया गाती ,
हुलसाई अमिया ,
अपने दिन ,
बरस के बहते ,
पानी से दिन.

युगल देख ,
अमिया भी बौराई ,
प्यार के दिन ,
मुश्किल से टिकते ,
झूले से दिन.

    - त्रिलोकी मोहन पुरोहित. राजसमन्द ( राज.)

शीत रूपसी .

धवल वेश 
रजत रूप धर,
शीत रूपसी .
थरथर कम्पन ,
प्रीत रूपसी .

नर्म धूप की ,
स्वर्णिम चादर ले ,
शीत षोडशी,
धीरे से आती-जाती,
सजी षोडशी.

संध्या वेला की ,
श्यामल गलियों में ,
शीत रूपसी ,
देखा तमस चढ़ा ,
भीत रूपसी .

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित. राजसमन्द ( राज.) 

Saturday, 8 December 2012

उज्ज्वल प्रकाश.


तुम हो कि मुझ से
दूर-दूर-दूर ,
और  मैं हूँ कि ,
तुम्हारे बिल्कुल,
पास-पास-पास.

तुम्हें नहीं मालूम,
तुम मेरे अन्दर,
और,
मुझ से ही प्रस्फुटित
जैसे सूरज-किरण,
और दोनों के पास,
एक उज्ज्वल प्रकाश.

वह झील , वह पानी ,
और
उन के आपसी रिश्ते,
जो कि करते हैं ,
एक दूसरे को परिभाषित ,
बिल्कुल उन के ही ,
आस-पास और साथ-साथ.

चुप हुई सितार को,
कल मैंने उठा लिया,
जमी हुई गर्द झाड़ने के लिए,
अनायास छू गयी ,
उस के तारो को ,
मेरी अनभ्यस्त हुई अंगुलियाँ,
और
तार थे कि झनझना उठे ,
शायद वे कहने लगे,
ज़रा समझो हमारी भी,
 एक लम्बी और मूक प्यास .

बहुत ही अजीब है ना,
हम ही नकारते हैं ,
हमारे अंतर के सत्य को,
सत्य ?
हाँ, हाँ ,वही सत्य ,
तुम्हारे अन्दर , मेरे अन्दर ,
वही तो चीखता है,
घायल आदमी  की तरह ,
और कहता है ,
मुझे चाहिए , मुझे चाहिए,
खरे स्वर्ण सा निश्छल विश्वास.

         -    त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

Tuesday, 4 December 2012

साफ झील में ,


आज के हाइकू-
============
अब कौओं ने ,
हंस-चाल सीखली ,
लूट मचाने .
******************
साफ झील में ,
उतर हैं बगुले ,
मछली देखी.
******************
श्येन देखता
मौज का अवसर,
गर्म गोस्त है.
******************
ध्यान सिखाये ,
अजगर आ कर ,
चूहों की बस्ती.
******************
दांत दिखाती ,
गिलहरी चिल्लाई,
सांप भागता.
******************

-              त्रिलोकी मोहन पुरोहित.


सुग्रीव कथन सुन ,व्यग्र सब वानर थे ,
             अंगद सहित तब , उग्र दिखने लगे.
लक्ष्मण का वाम हस्त ,शरधि पहुँच गया,
             शर तोल-तोल कर , क्रुद्ध दिखने लगे.
हनुमान देख रहे , चंचल हैं भट सब ,
             वक्र रेख आनन पे , चिंत दिखने लगे .
राम सुन दृढ रहे , जैसे शैल-श्रृंग रहे,
             राम जैसे राम रहे , राम दिखने लगे.

सुग्रीव को देख कर ,लक्ष्मण-संस्पर्श कर
             राम मुस्करा के कहे , शांतचित्त रहिए .
संगठन ले कर के , आगे बढ़ रहे हम ,
             संगठन हेतु आप , मंत्रणा को कीजिए.
विभीषण आकर के , शरण को चाहते हैं ,
             निर्णय लेने से पूर्व , अनुभव कहिए .
उचित व्यवहार जो , सर्वहित सत्य रहे,
             विभीषण हेतु तब ,शीघ्र कार्य कीजिए.

कोई वीर कहता है , रावण अनुज यह,
             उचित न लगता है , फिर भेज दीजिए.
कोई कहे अरि यह , बच के न जाए अब,
             दल सह मार डालें , समय न चूकिए.
कोई कहे निशाचर,अरि देश से आगत ,
             बंधन में डाल कर , अरि भेद लीजिए.
कोई कहे संदेही है , गुप्तचर लगाइए ,
             संदेह के दूर होते , शरण में लीजिए .

Sunday, 2 December 2012

निराकार सी .



===========
हरी दूब पे ,
शबनम तिरती ,
निराकार सी .
****************
रंग गंध में ,
या है गंध रंग में ,
निराकार सी .
****************
दसों दिशा में ,
पवन बह रही ,
निराकार सी .
****************
तेरी साँसों को ,
अपने में है पाया ,
निराकार सी .
****************
सच्ची कविता,
कल-कल बहती,
निराकार सी .
****************

   -त्रिलोकी मोहन पुरोहित.

शब्द-साधना मांगती

गंगा सम शीतल करे , शब्द नेह की धार .
तपे घृणा की आग में , शब्द हुए तलवार.

स्वर्ण-रजत के जोर पे ,किस ने पाया प्यार.
प्रेम - शब्द के जोर पे , प्यार करे व्यवहार .

शब्दों की सरिता चले ,खुलते विकट कपाट .
छैनी भी ठन - ठन करे , रचती रूप विराट .

शब्दों की विरुदावली , मम मुख बसो सदैव.
शब्द मुझे दाता दिखे , ब्रह्मा - विष्णु - महेश .

शब्द-साधना मांगती , सरल-सादगी-धार.
प्राण ज्यों ऊँचो चढ़े , ले अनुभव -विस्तार.

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित .

Saturday, 1 December 2012

सूरज योगी ,


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भोर के आते ,
चिड़िया नगमा गाती,
स्वस्ति वाचन .
*********************
भोर चली ,
रक्तिम किरणें दे ,
सिद्धि-आसन. .
*********************
सूरज योगी ,
धीरे-धीरे चढ़ता ,
सिद्धि-साधन .
*********************
मध्य दिवस,
रवि बहुत खरा ,
मन्त्र-पठन
*********************
संध्या के आते ,
रवि हुआ विनत ,
ये मुद्रा-ध्यान .
*********************
धीरे से जाए ,
रवि अस्ताचल को ,
ये विसर्जन .
*********************
गहन रात के ,
रवि शांत कक्ष में ,
करे सृजन.
*********************
     - त्रिलोकी मोहन पुरोहित.

राम को प्रणाम कर , सुग्रीव यों कह चले,
             प्रभु एक निशाचर , तट पर आया है .
मायावी प्रवृत्ति लिये ,सहचर साथ लिये ,
             श्याम-वर्ण भीम-देह , नभ-पथ आया है.
निशाचर छलिया है, घातक स्वभाव लिये,
             सच पूछे तो प्रभु जी , मृत्यु-मुख आया है.
अस्त्र-शस्त्र साथ लिये ,कथित संत्रास लिये,
             रावण अनुज वह , शरण में आया है .

निशाचर विभीषण , रावण अनुज वह ,
             रावण को भ्रष्ट कहे , संदेह उपजता.
रावण को अघचारी , बार-बार कहता है,
             भक्ति-भाव राम प्रति , आशंकित करता.
सीता के हरण को वो, अनुचित कहता है,
             रावण से पीड़ित है , संभव न लगता.
जानकी हरण हुए , कालसूत्र दीर्घ हुए ,
             हम आये वह आया , उचित न लगता .

प्रभु मम निवेदन , आप के समक्ष यह ,
             अरिभ्राता निशाचर , विश्वास न कीजिए.
रावण से पोषित जो , शरण में आगत है ,
             माँगता शरण वह , शरण न दीजिए.
सेना और संगठन , पढ़ना वो चाहता है,
             निशाचर दुष्ट होते, प्रवेश न दीजिए.
सोया हुआ देख कर , करेगा आघात यह ,
             भीषण है दाह सम , बढ़ने न दीजिए.


दुनियादारी.


============

हरे पेड़ पे ,
पंछी की हरकत,
दुनियादारी.
*****************
चिंता के मारे ,
पंछी तिनका ढोता,
दुनियादारी.
*****************
कल खाली था ,
अब नीड भरा है,
दुनियादारी.
*****************
नीड में बच्चे  ,
ममता से लड़ते,
दुनियादारी.
*****************
नीड एक था ,
अब दिशा अलग,
दुनियादारी.
*****************
पंखों में पल ,
अब पंख फैलाए,
दुनियादारी.
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नीड बड़ा था,
अब छोटा लगता,
दुनियादारी.
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नाजुक शीत


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नाजुक शीत ,
धूप के छंद रचे,
पढ़ते हम .
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पसरी धूप,
चादर सी लगती,
ओढ़ते हम .
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चांदी ऊपर ,
नीचे स्वर्ण राशियाँ,
मुग्ध हैं हम.
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एक हो गए ,
सूरज और चन्दा ,
कम्पित हम.
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दिन को धूप ,
ले ली रात रजाई,
सिकुड़े हम.
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रात की स्याही,
ले दिन का कागज़.
लिखते हम.
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धूप की टोपी,
हर कोई पहने ,
एक से हम.
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Wednesday, 28 November 2012

देख सगाई


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लाल फूल पे ,
जब तितली डोले,
देख सगाई
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दौड़ के पानी ,
सागर में पहुंचा,
देख मिताई .
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जड़ें ईख की ,
है खेत में गहरी,
देख ढिटाई .
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पके पत्र हैं,
उड़ते चिड़िया से,
देख विदाई.
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नव कोंपल,
हर शाख पे झूमे,
देख बधाई.
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Monday, 26 November 2012


सुग्रीव के सहचर , वानर उद्दीप्त हो के  ,
              किलक लगाते कहे ,अभी खींच देते हैं.
कपिराज कथन तो ,आप ने उचित किया,
              निशाचर छलिया है ,अभी चीर देते हैं .
धूर्त यह निशाचर , मूल रूप लिए हुए ,
              अन्य कोई रूप धरे , अभी धर देते हैं .
प्रभु राम से ये मिल ,पहुंचाए क्षति कोई ,
              पूर्व उस के ही इसे , अभी चांप देते हैं .

देखा सुग्रीव ने तब , वानर हैं उग्र सब,
              शांत कर कहते हैं , सब ध्यान दीजिए.
राम की शरण हेतु , आगत है निशाचर ,
              आगमन के कारण ,खोज लेने दीजिए.
विष के शमन हेतु ,विष ही जरूरी होता,
              ग्रहण से पूर्व उसे , शोध लेने दीजिए .
राघव से मिल कर , करे हम मंत्रणा को,
              तब तक इन पर , दृष्टि रख लीजिए.

सुग्रीव के इंगित से , धरा पर विभीषण ,
              विभीषण देह लगे , नीलमणि नग है.
वानर सुभट तभी , घेर लेते विभीषण ,
              वानर सुवर्णी लगे , स्वर्ण-रश्मि-रथ है.
सुग्रीव हुंकार कर , बढ़ चले राम ओर,
              तब कपिराज लगे , गति प्राण-पुंज है.
शुद्ध शुची शैल पर , सीतापति राम बैठे,
              लक्ष्मण के सह लगे , अमृत कलश है.




Saturday, 24 November 2012

पसरी दुर्वा,

पसरी दुर्वा,
हरित-पीत वर्ण,
जैसे जीवन .
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फैली दुर्वा ,
रेशा-रेशा फैलाए,
ऐसा जीवन.
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पौर-पौर पे,
दुर्वा से दुर्वा फैली,
जागा जीवन.
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शीर्ष जुकाए ,
सब सहती दुर्वा,
सादा जीवन .
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उठी धरा से ,
दुर्वा पूजा में आई,
प्यारा जीवन .
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-त्रिलोकी मोहन पुरोहित

भूख बोलती .



कल था पेड़ ,
आज ठूंठ बना है ,
भूख बोलती .
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धानी धरती ,
बंजर बन बैठी ,
भूख मारती.
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एक खेत था ,
आज डांग पड़ी है ,
भूख बांटती.
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गलबहियां ,
अब स्वप्न हुई है,
भूख भांजती .
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राजहंस थे,
सब आज भिखारी ,
भूख बनाती.
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मुक्ति मिलती .


आज के हाइकू -
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खिड़की खोली ,
है धूप गुनगुनी ,
मुक्ति मिलती .
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शाखा हिलती ,
नर्म धूप झूलती ,
मुक्ति खिलती .
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धूप दौड़ती,
लहरों पर चढ़ ,
मुक्ति बढ़ती.
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गर्द फैल के ,
नर्म धूप रोकती,
मुक्ति मरती .
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पौर-पौर पे ,
धूप के छोने बैठे,
मुक्ति सजती.
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                         - त्रिलोकी मोहन पुरोहित.

Wednesday, 21 November 2012

विभीषण का सुग्रीव को राम की शरण हेतु  निवेदन -
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सागर के कूल पर , सुग्रीव विचरते हैं ,
               देख कर विभीषण , संशय हो जाता है.
कर-कर इंगित वो , कहते हैं देखो भट ,
               यह कोई निशाचर , भेद लेने आया है .
आरोहित नभ में है , साधन सम्पन्न यह ,
               सहचर लिए हुए , छल रूप पाया है .
नाग सम अस्त्र लिए, क्षपा सम शस्त्र लिए ,
               नग सम देह लिए , अरि सम आया है.

सुग्रीव के कहते ही , विभीषण बोल पड़े ,
               हे सुमंत ! सुग्रीव मैं , रावण अनुज हूँ.
हीनबुद्धि अहंकारी , सीता का हरणकर्ता ,
               अघचारी रावण से , सदैव पीड़ित हूँ.
शतवार कह दिया , सीता सौंपने के लिए ,
               रामारि वो सुने नहीं , रावण से त्रस्त हूँ .
धन धरा सुत हीन , विभीषण राज्य हीन ,
               राघव की शरण में , आया हुआ जन हूँ.

राम से विमुख नहीं ,अरि मुझे मानो नहीं ,
               राम से जा कर कहें , सत्य हेतु आया हूँ.
रावण की वाटिका में , सीता का घुटन देखा ,
               सीता के घुटन से मैं , त्रास लिये आया हूँ .
रावण ने राज-द्रोही , मुझ को सभा में कह ,
               संदेह के बंध बांधे ,  शरण में आया हूँ.
दशानन पविकर्ण , सुने नहीं सत्य कभी ,
               सत्य सुन अरि हुआ , प्राण लिये आया हूँ .





Monday, 19 November 2012


रावण को भ्रष्ट मान , कह चले विभीषण ,
               निशाचर-नृप आप , सरल स्वभाव नहीं .
कह-कह थक गया , नीति की धवल बातें,
               लगता है नीति कभी,आप को स्वीकार नहीं .
निशाचर हित हेतु , आप के कल्याण हेतु,
               धर्म-युक्त बातें कही , आप में सुधार नहीं .
लंका सदा फले-फूले , यही भाव भरे कहा,
               राज-द्रोह कह दिया ,उचित व्यवहार नहीं .

तात सम अग्रज हो , तनय सा अनुज हूँ ,
               क्षमा करें अब तात , श्रद्धाभाव जानिए .
सत्ता और शासन का, मोह नहीं पाला कभी,
               लंकापति बने रहें , सिंहासन रखिए .
मधुर कथन सब , कर रहे लोग अत्र ,
               मित्र व अमित्र कौन , आप पहचानिए.
यत्र सीता-राम प्रति , होता द्रोह मुखरित,
               राम भक्त रुके कैसे , सुखकर रहिए .

सिंह-गर्जना के सह , विभीषण तत क्षण,
               रावण को नम कर , नभ चढ़े जाते हैं .
सर्व जन मंगल के , सुन्दर सुपात्र बने,
               क्षण एक ठहर के , कहे चले जाते हैं.
अग्र विभीषण चले , पश्च अनुचर बढे,
               मानो यज्ञ-धूम घन , उड़े चले जाते हैं.
जल भरे नेत्र लिये , अंतर में राम-नाम,
               राम से मिलन हेतु ,उस पार जाते हैं.


Sunday, 18 November 2012

ममता बांधें .


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धूल उडाती ,
गायें घर को लौटी,
ममता बांधें .
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भरी घास में ,
शेर पसर जाता,
बकरी मारी .
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नीला नभ है ,
श्येन ऊपर-ऊपर,
चिड़िया काँपे .
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कई दिनों से ,
नभ में चन्दा आया ,
थी पडौसन .
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हवा चली तो ,
स्वर बंसी बहता ,
थी विरहिण .
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Saturday, 17 November 2012

रोया था नभ .


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ओस की बूंदे ,
पूरी रात गिरी थी ,
रोया था नभ .
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नभ गरजा ,
धरती हिलती है,
मांगे हिसाब .
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हवा चली है ,
खिड़की हिलती है,
होगा मन का .
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लाल नभ से,
सरोवर भी लाल ,
तू क्यों न लाल .
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दायें से बाएं,
उड़ गया परिंदा,
तू ना बदला .
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Monday, 12 November 2012

सर्वस्व तुम पर छिड़क दूंगा


 अंधकारा में कौन बैठा ,
          सुबकता है
     ज़रा मेरे पास आओ ,
आलोक तुम पर छिड़क दूंगा.

जानता हूँ बहुत सारे घाव तेरे .
मानता हूँ बहुत सारे  दर्द  तेरे.
      दर्द ढोता कौन बैठा ,
            सुबकता है,
      ज़रा मेरे पास आओ.
कोमल हृदय में तेरी जगह है.
नेहघट तुम पर छिड़क दूंगा .

देखता हूँ बहुत तेरी है घुटन .
लेखता हूँ बहुत तेरी है टुटन.
    छटपटाता कौन बैठा ,
            सुबकता है,
     ज़रा मेरे पास आओ.
मेरी साधना में आराध्य सा तू.
प्राणघट तुम पर छिड़क दूंगा .

सुन रहा हूँ सांसों के सरगम तेरे.
सुन रहा हूँ आहों के  नर्तन  तेरे .
     व्यथित होता कौन बैठा,
              सुबकता है,
       ज़रा मेरे पास आओ.
अब अकेला तू नहीं है मान ले .
सर्वस्व  तुम पर छिड़क दूंगा

आज के हाईकू- लड़ते योद्धा.


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काली रातों में,
झिलमिलाते दीप,
लड़ते योद्धा.

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बिखरी गई ,
आँगन में किरणें,
बनी रंगोली.

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स्वर्ण आभ से ,
झिलमिल धरती,
वधू सजी है.

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नन्हें दीपक,
झिलमिल अवली,
नक्षत्र सजे.

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काला पन्ना,
खचित स्वर्ण रेख,
बनी दिवाली.

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Sunday, 11 November 2012

आज के हाइकू -हुई दिवाली .


आज के हाइकू -
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शक्ति केआगे
हार गये असुर ,
हुई दिवाली
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शस्य श्यामला ,
धानी चूनर धारी,
हुई दिवाली.
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राम जीत के ,
जब घर पहुंचे ,
हुई दिवाली .
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रोग-शोक से ,
जब धरा मुक्त थी,
हुई दिवाली.
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मिल के रोके,
शोषण के पहिये,
हुई दिवाली.
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बंधन तोड़,
रचा नव सृजन,
हुई दिवाली.
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गलबहियां,
हर हाथ ने बांधी,
हुई दिवाली.
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Saturday, 10 November 2012

आज के हाइकू - शुभ दिवाली .



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झिलमिलाती ,
वह दीप शिखा सी,
हुई दिवाली .
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वह मुस्काई ,
काली रातें बदली ,
सजी दिवाली .
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फूलझड़ी सी ,
जब साडी दमकी,
कही दिवाली .
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लिए थाल में ,
ले दिवले चलती ,
चली दिवाली.
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ऊपर नीचे,
वो दिवले धरती ,
कहे दिवाली .
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सब से मिल,
मीठे मुंह से बोले,
शुभ दिवाली.
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देहरी-द्वारे,
घर-आँगन चाहे ,
पूर दिवाली .
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Friday, 9 November 2012

आज के हाइकू -प्यार बड़ा था.




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वह नम्र था ,
दुहरा लगता था ,
कद बड़ा था .
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अपना कौर ,
साथ वाले को देता ,
संत बड़ा था .
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बोझ पिता का ,
हँस कर ढोता था,
बेटा बड़ा था.
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बिन सोचे ही,
तज गया वो प्राण,
प्यार बड़ा था.
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सब छोटे थे ,
भूख-प्यास व नींद,
लक्ष्य बड़ा था.
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सबसे लड़ा ,
परवाह नहीं की ,
यार बड़ा था.
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टिका दी पीठ,
आश्रय जो मिला था,
पथ बड़ा था.
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थम गए पाँव ,
देख कर मंजर ,
दर्द बड़ा था.
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Thursday, 8 November 2012

मेरे प्यार का , इम्तिहान न लो .


मेरे प्यार का ,
इम्तिहान न लो ,
चलो भी यहाँ से ,
कुछ देर घूम आयें,
और
छोड़ दें ,वे मील के
पत्थर सी जमी हुई
हमारी दुरभिसंधियाँ .

यह ठीक नहीं किया ,
रो-रो कर बहा दिया ,
सितारों सी चमकती ,
आँखों का अंजन.
खुल कर बिखर गयी,
मसृण काली केश राशि ,
जैसे बिखर चली हो ,
गाँव पहुँचाने वाली ,
वक्रिल पगडण्डीयाँ ,
उन्हीं  में उलझ कर ,
मैं तो रह गया हूँ ,
चलो कहीं चलते हैं ,
जहां छूट जाए उलझन ,
मिले कोई ठोर-ठिकाना.



तुम्हारे प्रश्न हमेशा ,
बहुत ही छोटे होते हैं ,
पर वे सब के सब बहुत
जटिल हुआ करते हैं ,
जैसे उलझे हुए ,
लाल-पीले गुडिया के बाल,
वे उत्तर से पहले ही ,
मेरे मुंह में गुल जाते हैं,
छोड़ जाते हैं मधुर स्वाद.
मैं मुग्ध हो कर तुम को ,
बस देखता ही रह जाता हूँ ,
और ,
तुम उसे मान लेती हो ,
अपनी ही अवमानना ,
चलो भी अब ,
तुम्हारे सभी प्रश्नों का हल ,
कहीं एकांत में बताता हूँ ,
यहाँ बहुत भीड़-भक्का है,
तुम बहुत शर्म कोगी.

हमारी दुनिया में ,
नित होते रहते हैं ,
छोटे-बड़े नाटकीय खेल,
हम हैं कि ,
हर रूपक में.
जोर-शोर से अपनी भूमिका,
कस कर खेलते हैं ,
लेकिन,
हर रूपक का अंत ,
बहुत त्रासद होता है ,
और ,
सँभलने से पहले ही,
नव भूमिका में हमें ,
धकेल दिया जाता है ,
अंत में,
पुनरावृत होता है ,
फल के रूप में त्रासद अंत ,
चलो भी कहीं अलग ,
जहां हम ही रचें कोई ,
छोटा सा मधुर  रूपक ,
त्रासद अंत से विलग .

आज के हाइकू - मन पतंग



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चढ़ती जाये ,
आशा की डोर लिये,
मन पतंग .

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होती नवीन ,
आशा के बाजारों में ,
मन पतंग .

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खूब चिढ़ाती ,
इठलाती दिखती ,
मन पतंग .

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कट जाती है ,
खुले पेंच लगाती,
मन पतंग.

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घर के आगे ,
वे धरी रह गयी ,
मन पतंग .

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समय लिये ,
चिंदी हुई रखी है,
मन पतंग.

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आज के हाइकू - रब जो मिला .




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देखा उस को  ,
हुआ आनन लाल ,
कमल बना .

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निरा बांस था,
जब से होंठ चढ़ा ,
बंसी ही जाना .

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कोरा कागज़
ढाई आखर ले के ,
दिल पे आया.

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तुम जो आये ,
भरी दुपहरी में ,
सावन आया .

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सब दे कर ,
सब कुछ पा लिया ,
रब जो मिला .

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Tuesday, 6 November 2012

आज के हाइकू- यही प्यार है.



धरा जली तो,
बादल गर्जे-वर्षे,
यही प्यार है.

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आग कहीं पे ,
है जलन कहीं पे,
यही प्यार है.

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इक जाता है ,
इक द्वार पे रोये,
यही प्यार है.

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आँखें बरसी,
तब दामन भीगा,
यही प्यार है.

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उस ने सोचा ,
उसे हिचकी आयी,
यही प्यार है.

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Sunday, 4 November 2012

आज के हाइकू - संभव कैसे ?



परिधि ले के ,
है प्रिय से मिलना ,
संभव कैसे ?
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लगा अडंगा ,
है चाह बढ़त की,
संभव कैसे ?
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कटु वक्ता को,
हो सुगीत श्रवण,
संभव कैसे ?
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प्रतिभा-पानी,
तरल-सरल ना,
संभव कैसे ?
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आग लिए तू ,
अब सो सकता है ,
संभव कैसे ?
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Thursday, 1 November 2012

रोटी भी कच्ची मिलेगी तुम कहो .



लिजलिजी बातें न तो अब तुम कहो.
कुछ  खरी  बातें  सुनें  जब तुम कहो.

कुछ  खतों को छोड़ कर वह चल पड़े .
उन  खतों की बात को अब तुम कहो .

नित  नये  नाटक यहाँ पर दिख  रहे .
कौन  इन  का  है  नियंता  तुम कहो .

जब  तुझे बोसा दिया तब तुम खिले .
पलट  के देखे  न  वे क्यों  तुम  कहो.

कुछ  लुटेरे  लूट  के अब   बस  गये.
अब  ज़रा  उन के ठिकाने  तुम कहो .

खबर  देने   का  भरोसा   कर   गये .
वह  कहाँ  सोये  पड़े अब  तुम  कहो.

आग-इंधन  भी  यहाँ  सीमित  हुए .
रोटी भी कच्ची  मिलेगी तुम  कहो .

करवा चौथ पर हाइकू



( १ )
चाँद सलोना ,
चमक गगन में ,
घर भी आया .
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( २ )
वह मुस्काई ,
नभ खिली चांदनी ,
घर मुस्काया .
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( ३ )
भाल पे बिंदु ,
देख चाँद लजाया ,
घर हर्षाया.
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( ४ )
चन्दा-मुख पे ,
लट्टू नन्द किशोर ,
घर पे आया.
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( ५ )
चाँद-चांदनी ,
जुग-जुग रहियो ,
घर ने गाया.
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Wednesday, 31 October 2012

हाइकू - इश्क के नाम


( १ )
इश्क के नाम
जिंदगी एक मिली  ,
दे कर देख .
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( २ )
कहा-लिखा तो
होता इश्क व्यर्थ है ,
जी कर देख.
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( ३ )
इश्क के लिए ,
वह रोज मरता ,
पूजा में देख.
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( ४ )
इश्क का मोल ,
सिक्कों से नहीं लगा ,
पीर में देख .
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( ५ )
बादशाहत ,
नित सिर धुनती ,
इश्क में देख.
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Sunday, 28 October 2012

हाइकू -



( १ )
चराग जले ,
ना नेह था न बाती,
तुम जो मिले.

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( २ )
हम थे मिट्टी ,
तुमने छू जो दिया
अब कंचन .
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( ३ )
दो टूक हुए ,
मारा नहीं खंजर ,
रूठ वो गए .
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( ४ )
एक लिफाफा ,
भारी है दौलत पे ,
वो उन का है .
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( ५ )
प्यार किया था ,
सर नहीं  दे सका,
व्यर्थ ही जिया.
****************

Saturday, 27 October 2012



(१)
गूंगी सितार ,
अब गाने है लगी ,
जो तूने छुआ.

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(२)
भाप सा उड़ा ,
चट "मैं" का घमंड,
सूरज आया.

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(३)
रोटी का स्वाद ,
भरा पेट क्या जाने ,
भूख बताये.

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(४)
लूट कर लाया ,
पराया मालमत्ता ,
नींद दे आया .

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( ५ )
पंचम स्वर ,
जो सावन में अंधी
कोयल गाये .

Thursday, 25 October 2012

कल तेरा मैं लिख रहा बिगड़ा न कर .


ज़रा  ज़रा सी बात पर बिगड़ा न कर.
आईने में  शक्ल देखी  बिगड़ा न कर .

हर बात पर कटखना  बन काटता है .
एक चिकोटी  काटी है बिगड़ा न कर.

नित कुचल  कर  हंसता है तू रोज ही
क्षुद्र तिनका आँख में हूँ बिगड़ा न कर.

लहू  की  सौगंध खा कर ताव खाता .
लहू से लहू मिल चला बिगड़ा न कर.

मेरा  कांधा बहुत तुझ को रास आया .
आखिरी  कांधा दे रहा बिगड़ा न कर .

रोज मुझ पर अपनी दाढ़ें गाड़ता था .
दांत  मैनें  भी दिखाए बिगड़ा न कर .

सब का खा कर भी डकार लेता नहीं.
तोंद की ही थाह ली है बिगड़ा न कर.

एक समय था कि परों को बीनता था 
अब परिंदों के परों पर बिगड़ा न कर .

जिस घृणा  से  जिंदगी तू ने बिताई .
पूरा ज़माना हँस पडा बिगड़ा न कर .

इक कटोरा ले के आया मेरे लिए तू .
मैं  कटोरा  फेंकता हूँ बिगड़ा न कर .

हर  बार  मेरी  किस्मतें लिखता रहा .
कल तेरा मैं लिख रहा बिगड़ा न कर .




दिल से रिश्ता जोड़ा है जुदा न मान.


बहते आंसुओं को तू पानी न मान.
देखो आया सामने सपना न मान .

झील को तू ने छुआ तो लहरें उठीं .
दिल भी वैसे कांपता सोया न मान .

आज कल चर्चा हमीं पर होती है .
यह तो होता ही रहा हर्जा न मान.

तू एक कंकर फेंक कर के देख ले.
चीख-चिंगारी होगी चुप्पी न मान .

उड़ती पतंग अपने हाथों कट चले.
बेरुखि सब मानते हैं होना न मान.

सूखे पत्तों की खडखडाहट सब तरफ  .
हवा चली तो जायेंगे ये गम न मान .

क्या काजी का आना जरूरी होता है  .
दिल से रिश्ता जोड़ा है जुदा न मान.

Thursday, 18 October 2012

तेरा नकाब .


कितना बेमानी है ,
यह पूछना कि,
कैसे हो ?
जब कि हाथ में ,
पकड़ा हुआ चाकू ,
अभी भी पूरी तरह से
रक्त से है लाल सुर्ख .

लाने को तो लाये थे ,
ठंडा पानी ,
परन्तु ,
मेरे होठों को ,
तर करने के बजाय ,
मेरे ही चारों ओर,
बिखेर दिया ,
और ,
भीड़ में कहते हो ,
तुम्हारे लिए ,
क्या नहीं कर सकता?

सच में ,
तुम रुग्ण हो,
शवों पर करना
चाहते हो शासन ,
इसीलिए ,
सहन नहीं कर पाते,
जीवित की प्रतिक्रिया ,
और ,
हो जाते हो,
हिंसक ,
आदमखोर की तरह.

मैं घायल हूँ ,
और ,
मेरे घाव हैं ,
मेरी पहचान ,
मेरे ताजा घावों को ,
तुम कुरेद कर ,
और हरे करते हो,
मैं दर्द से ,
बिलबिलाता तो हूँ ,
पर ,
नित्य ही मेरा कारवाँ ,
बढ़ता चला जा रहा है ,
एक अच्छी खबर सुन ,
तेरा नकाब ,
अब बहुत ढीला हो रहा है .

Monday, 15 October 2012

अब मैं पवित्र हूँ .


तुम ने कितनी बार ,
अपनी दृष्टि से ,
मुझे छू लिया ,
और ,
हर बार किया है ,
मैंने शुचि अभिषेक ,
अब मैं पवित्र हूँ ,
किसी तीर्थ की तरह.

तुम्हारे कहे गये शब्द ,
मेरे कानों में ,
सीटियों की तरह गूंजते हैं ,
और ,
किसी अनुगूंज की तरह ,
दिशा-दिशा से टकराकर ,
लौट-लौट आते हैं ,
तब ,
मैं व्याकुल हो कर ,
तुम्हें तलाशता हूँ ,
खिलौने की चाहत में व्याकुल
किसी अबोध बच्चे की तरह .

कितनी बार तुम्हारी गंध
मेरे चारों ओर ,
लिपट जाती है ,
ओर ,
तुम्हारे भाव-तारल्य से ,
मैं भीग जाता हूँ ,
आपन्मस्तक ,
भोर में गिरती ओस बूंदों से ,
भीगे हुए मंदिर-कलश की तरह .

मैंने बहुत तोड़े हैं,
पत्थर ,
जमीन को किया है ,
समतल ,
वीथियों की जगह बनाये ,
राजपथ ,
चिनायें हैं शानदार ,
प्रासाद ,
लगाये हैं फलदार विटप ,
सजाये हैं हरित दुर्वा के ,
उद्यान,
ताकि तुम्हें ,
अपने पास रोक सकूं ,
परन्तु ,
साध दी गयी है मुझ पर गुलेल ,
और ,
बन गया हूँ किसी शिकार की तरह.

कितनी बार पकड़ी है ,
मैंने रोशनी की डोर ,
जिस के सहारे ,
तुम तक पहुँच सकूं ,
क्योंकि ,
मैंने जाना है ,
तुम रोशनी का हो श्रोत ,
भर लेना चाहता हूँ ,
तुमको अन्दर-बाहर ,
इसीलिए ,
खींचा चला आ रहा हूँ ,
कामना लिए किसी पतंगे की तरह.

एक तुम और एक मैं.


सागर के किनारे ,
अकेले टहलता हूँ ,
जब से अकेला हूँ ,
यह एकाकीपन आया
या ,
मैंने ओढ़ लिया ?
यह प्रश्न नहीं है ,
प्रश्न तो यह है -
तुम्हारे जाने के बाद ,
आखिर कर मेरी ,
श्वांस चलती कैसे है ?

समंदर की लहरें,
आती हैं
और लौट जाती हैं ,
जैसे तुम आ कर ,
लौट गयी थी.
हर बार लहर
आ कर गुदगुदाती है ,
और लौट कर ,
उदास कर जाती है ,
तुम इस के मायने ,
समझ सकती हो .

समंदर से लहरें ,
उठ-उठ कर आती हैं ,
और ,
आते-जाते ,
मिलते-मिलाते ,
विलीन हो जाती हैं,
या,
नये रंग -रूप में ,
फिर-फिर उठ आती हैं,
मेरी उम्मीदों को हमेशा,
ज़िंदा रखने के लिए .

सब लोग कहते हैं -
समुद्र एक है
और
लहरें अनेक हैं ,
मेरा इस में ,
कोई विरोध नहीं है ,
यह उनका दर्शन है ,
मेरा मानना है ,
समुद्र एक है .
और ,
लहरें दो ही हैं ,
एक तुम और एक मैं.

हमारी एक ही मंजिल .


हमारे मध्य नहीं है ,
कोई भी घोषित या
अघोषित प्रतिस्पर्धा.
फिर ,
हम एक दूसरे के प्रति ,
कैसे हो सकते हैं हिंसक .

साथ चलने की ,
उत्कट इच्छा में ,
कभी टकरा जाते हैं ,
हमारे कंधे और हाथ ,
देख लेते हैं आपस में ,
कनखियों से ,
जैसे देखते हैं ,
साथ-साथ चलते,
मुसाफिर ,
इसे भला,
कैसे मान लें द्वंद्व .

मैं रोज जीना ,
चढ़ता-उतरता हूँ ,
हर आहट पर
तुम्हारे पदचाप ,
सायास सुनने का
प्रयास करता हूँ ,
तुम्हें सामने
देखने की इच्छा में ,
नहीं देख कर ,
सूखी रंगोली सा ,
फैल जाता हूँ ,
तब ,
कैसे मान लूं .
नहीं है
हमारे मध्य सम्बन्ध.

हम बढ़ रहे हैं ,
एक ही दिशा में ,
और रखते हैं ,
एक दूसरे की ,
खोज-खबर ,
फैल जाती है ,
हमारे अंतर की,
आत्मीयता की गंध ,
जैसे फैल जाती है ,
मां की सेकी हुई ,
रोटियों की गंध ,
अब ,
इन हालात में ,
कैसे कहूं नहीं है ,
हमारी एक ही मंजिल .

Thursday, 11 October 2012

नव आशा से , भरता हूँ.


जितना तुम को,
याद किया है ,
उतना ही तो,
कटता हूँ .

तुम को भूलूँ ,
कैसे भूलूँ ,
इस कोशिश में ,
बंटता हूँ .

तुम में मुझ में ,
क्या अंतर है ?
लिए आईना
पढ़ता हूँ .

भरे सरोवर
में कमलों के ,
नखरों से अब ,
डरता हूँ.

तुम आओगे ,
या जाओगे ,
इन प्रश्नों से ,
लड़ता हूँ .

हंसों को घर ,
आते देखा ,
नव आशा से ,
भरता हूँ.

Saturday, 6 October 2012

घर कैसे बनते सीखता जा.


चल रे बाबा , रेत पे चल ,
घर बिखरे हैं , रेत पे चल .
रेत पे अपने ,पैर तू धर ,
पैर पे अपने , रेत को धर .
धीरे-धीरे रेत को थपता जा ,
घर कैसे बनते सीखता जा.

चल रे बाबा , खेत पे चल ,
घर खाली हैं , खेत पे चल .
मिट्टी से अपने हाथ तू सन ,
हाथ से अपने खेत को खन,
धीरे-धीरे खेत को खनता जा ,
घर कैसे भरते सीखता जा.

चल रे बाबा , नदी पे चल ,
घर डूबे जाते ,नदी पे चल .
कागज से अपनी नाव बना,
नदी में अपनी तू नाव तिरा ,
धीरे - धीरे नाव तिराता जा ,
घर कैसे तिरते सीखता जा.

चल रे बाबा , आँगन पे चल ,
घर बिखरे हैं , आँगन पे चल .
आँगन में आ कर मित्र बुला ,
मित्र बुला कर नव खेल रच.
धीरे-धीरे मित्रों में घुलता जा ,
घर कैसे बंधते सीखता जा .

चल रे बाबा , बाहर को चल ,
घर में घुटन ,बाहर को चल .
इधर-उधर देख कदम बढे ,
कदम बढे तो तू कदम बढ़ा .
धीरे-धीरे कदम बढ़ाता जा ,
घर कैसे चलते सीखता जा.

Thursday, 4 October 2012

बोलो , मेरे मित्र कुछ तो बोलो


कुछ लोग मिलते हैं ,
किसी लम्बे ,
पड़ाव पर .
कुछ क्षण में ही ,
आत्मीयता के बंध ,
मजबूती से बंध जाते हैं ,
जैसे लिपट जाए ,
रेंगती हुई कोई लता ,
किसी बढ़ते हुए पेड़ से .
तब क्या कहें ?
अनायास मिलन....
सौभाग्य .......
या
पूर्व जन्म का प्रारब्ध .
बोलो , मेरे मित्र कुछ तो बोलो

इसी चिंतन से ,
हाथों की पेन्सिल ,
हिलती रही ,
चलती रही ,
और ,
कुछ आकृतियाँ ,
उभरती गयी .
किसी ने कहा ,
यह चित्र है ,
किसी ने कहा ,
यह अचित्र है .
किसी ने कहा ,
यह आकृति है ,
किसी ने कहा ,
नहीं ,
यह एक विकृति है ,
मैं क्या मानूं ?
चित्र , अचित्र ,
आकृति या विकृति ?
बोलो , मेरे मित्र कुछ तो बोलो

ओह ! जब-जब तुम मिले,
जिस -जिस रूप में मिले ,
वाकई अद्भुत है .
अब तुम्हारे मिलन को
क्या कहूं -
घटना , संयोग ,
सम्बन्ध , आकर्षण
या,
पूर्व जन्म का कोई,
रिश्ता -नाता ,
या , फिर कोई ,
मनभावन समय का खेल ?
बोलो , मेरे मित्र कुछ तो बोलो .

Tuesday, 2 October 2012

मेरे रोने पर हँस पड़े हो यार क्या कहने .


तुम्हारी इन अदाओं के यार क्या कहने.
मेरे रोने पर हँस पड़े हो यार क्या कहने .

वो भी दिन था कि तुम मेरे पास आते थे ,
मुझ से मेरा ही पता पूछते हो क्या कहने .

गिड़गिड़ा कर माँगते थे मुझ से मेरे हाथ ,
वही हाथ मैले लगते हैं आज क्या कहने .

कहते थे मेरा खूँ गंगा के पानी सा निर्मल ,
अब पानी समझ के बहाते हो क्या कहने .

चीख कर माथे पे छप्पर की बातें कही थी ,
टीन-टप्पर ही उड़ा ले गए यार क्या कहने .

कभी मेरी बातें गीत - गजल हुआ करती ,
अब गर्म लावे सी वो लगती है क्या कहने .

कल तुम ने ही तीली जला कर दी मेरे हाथों ,
अब कहते हैं यह मेरी अदावट है क्या कहने.

मुझे मालूम है तुझे लौट कर आना है कल ,
गडियाली आंसू बहेंगे फिर यार क्या कहने .

Monday, 1 October 2012

तुम उस पार , मैं इस पार


  तुम उस पार , मैं इस पार
        बांधना चाहता हूँ ,
श्वांसों की झीनी नाजुक सी वो डोर.

मुझ को हिचक है तेरी गली में ,
तुझ को हिचक है मेरी गली में ,
         देखना चाहता हूँ ,
तेरी गली की सुर्ख रंगत लिए भोर .

चर्चा तुम्हारी खूब  मैंने सुनी है ,
चर्चा हमारी खूब तुमने सुनी है,
        मिलाना चाहता हूँ ,
कच्चे धागे के छिटके हुवे दो छोर .

सब लोग माने तुम हम से अलग हो ,
हम ने न माना तुम हम से अलग हो ,
        बताना चाहता हूँ ,
सदा से बसे हो मुझ में मेरे चितचोर.

लोग हंस के मारे  रोज पत्थरों से ,
महल भी चुना है उन्हीं पत्थरों से ,
         दिखाना चाहता हूँ ,
दर्द से भरा मेरे महल का पोर-पोर.

तुम्हें क्या पड़ी है जो सुध लो हमारी ,
हम नित्य सजाते छवि जो तुम्हारी ,
         ध्यान चाहता हूँ
घायल पंछी सा पहुंचा हूँ तेरे ही ठोर

Sunday, 30 September 2012

अपने ही पापा के घर.



मैं तितली सी ,
सदा रही हूँ ,
सतरंगी पंख लिए
अपने ही पापा के घर.

खाई - खेली ,
तुतलाई हूँ ,
उठी - गिरी हूँ ,
इठलाई हूँ ,
दुनिया से ,
दो बातें करना,
मैंने जाना ,
अपने ही पापा के घर.

अकडम - बकडम,
के खेलों से ,
इत्ती-बित्ती ,पंचा कांकर,
के खेलों से ,
जीत -हार का मतलब ,
परिभाषित करना ,
मैंने जाना ,
अपने ही पापा के घर.

भाई-बहिनों से  ,
सीख वकालत ,
संगी-साथी से ,
मान-मनोवल  ,
रिश्तों की मधुर गंध,
को रूपायित करना ,
मैनें जाना ,
अपने ही पापा के घर.

रेत-ढूह में खूब घरौंदे ,
रच-रच कर के ,
खेती-बाड़ी छत-आँगन ,
रच-रच कर के ,
गुड्डे - गुडिया की दुनिया से ,
वर्तमान को सहेजना ,
मैंने जाना ,
अपने ही पापा के घर .

अब सहेजती ,
प्रियतम का घर ,
रोके-मौके आना-जाना ,
अब पापा के घर ,
सरस बादली बन कर छाना ,
हर उष्मा पर बरसना ,
मैंने जाना ,
अपने ही पापा के घर.

Thursday, 27 September 2012

घूँट-घूँट ही सही मुझे दर्दों को पीने दो .


         निर्जन कौने में बैठा
              वह पीता है,
          उसको रोका तो बोला
घूँट-घूँट ही सही मुझे दर्दों को पीने दो .

        रूखे व्यवहारों से मारा,
                 वह रोता है ,
          बिंधा हुआ वह बोला ,
पहचान मिली अब ऐसे ही जीने दो .

         टूटन-दरकन में जीता ,
               वह दबता है,
    कलम उठाई तो वह बोला ,
इन कलमों को अब तीखा लिखने दो .

     अश्रु - मिट्टी लिए साथ में,
             वह सनता है,
     नमक उठा कर वह बोला ,
खार लगाना वो चाहे तो लगने दो .

         अपने घावों को खोले ,
            वह कंपता है,
      अँगुलियों पर गिनते बोला,
मेरे दिन भी आते हैं अब मिलने दो .

     

Wednesday, 26 September 2012

जीवन का रूप सामने आ जाए.


मैं आऊँ या ना आऊँ ,
अब तुम आना ,
आ कर के यों घुल जाना ,
जैसे पानी में पानी घुल जाए.

तुम को देखूं या ना देखूं ,
अब तुम देखो ,
इतना देखो तुम मुझ को ,
दोनों आँखें पूरी ही भर जाए.

तुझे ओढ़ कर फटे हाल हूँ ,
अब तुम ओढो ,
इतना ओढो तुम मुझ को ,
सारा सच बाहर को आ जाए.

जिन गीतों को मैंने गाया ,
अब तुम गाना,
उन गीतों को ऐसे गाना ,
ह्रदय तेरा बाहर को आ जाए.

मैं रिश्तों में खेल बना ,
अब तुम खेलो,
उन रिश्तों को ऐसे खेलो ,
जीवन का रूप सामने आ जाए.

Sunday, 23 September 2012

सच! कहाँ रहते हो ?


सच ! कहाँ रहते?
घर-परिवार ,अन्दर-बाहर ,
तन में,मन में,बुद्धि-बल में ,.
पर,
ये सब तो बिखरे है ,
किंचित इन में प्राणों को सींचूं .

जन में ,गण में ,उपवन में ,
शहरों - कस्बों या ग्रामों में ,
पर ,
ये सब तो अस्त-व्यस्त है ,
किंचित इन को किरण दिखा दूं .

शैशव-कैशोर्य-योवन में ,
प्रौढ़ता या जरावस्था में ,
पर ,
ये सब तो बहुत डरे हैं ,
किंचित इन को निर्भय कर दूं .

लेखन - चिंतन - गायन में ,
आख्यायन या चित्रायन में ,
पर ,
ये सब तो अलग-थलग है ,
किंचित इन को संयोजित कर दूं.

तर्कों - वाणी - प्रमाणन में ,
रीति-नीति-छंदानुशासन में ,
पर,
ये सब तो वाग्विलासी हैं ,
किंचित इन को जीवन दिखला दूं .

ध्यान - धारणा - समाधि में ,
आवर्तन-परावर्तन-पलायन में ,
पर,
ये सब तुझ से बहुत विमुख है ,
किंचित इन को दिशा दिखा दूं .

नव अंकुरण के उल्लास में ,
श्वांसों के तू मुक्त विलास में ,
पर,
ये सब तेरा मूर्त रूप है ,
किंचित इन से ही झोली भर लूं.

Saturday, 22 September 2012

तब तक खोल चलूँ वे खिड़कियाँ .


   मैंने चाहा खुल जाए ,
          बंद पड़ी
     कुछ खिड़कियाँ .
हर खिड़की से चेहरा झाँके  ,
चेहरा देखे चलती गलियाँ .

   बंद कपाटों के पीछे तो
          सिसक रही
        बस सिसकियाँ
हर सिसकी में अपना रहता ,
अपना मांगे अपनी खुशियाँ .

     सतरंगी पंख फैलाये ,
            उड़ना चाहे ,
         कुछ तितलियाँ .
नम्र पवन अब देती निमंत्रण ,
देती निमंत्रण कोमल कलियाँ .

   आती होगी तुम को भी ,
          मीठी-मीठी ,
         कुछ हिचकियाँ ,
समझ लेना अपना ही भूखा,
झूझ रहा कर के मधुकरियाँ.

    दर्द ह्रदय में करवट ले के
             तीखी काटे
           कुछ चुटकियाँ ,
तब साथ मेरे तुम चल सकते हो ,
तब तक खोल चलूँ वे खिड़कियाँ .

Thursday, 20 September 2012

कुछ मशालें दहती हैं .

दीवारों से जो गिरा हुआ हूँ ,
मुक्ति की बस चाह रखी है ,
हाथ लगाकर दीवारों को ,
         सहलाया ,
   धीरे-धीरे ही सही पर ,
   रेत हुई वह ढहती है .

इधर दीवारें - उधर दीवारें ,
घने तमस में निराकार हैं ,
सिकुडन व एकाकीपन को ,
         बतलाया ,
   धीरे-धीरे ही सही पर ,
   इक चिंगारी जलती है .

भारी भरकम लगी बेड़ियाँ ,
खन-खन करती हैं झंझीरें ,
बंधन में जो लिए ऐंठ है ,
         टकराया ,
   धीरे-धीरे ही सही पर ,
   स्वर विद्रोही भरती है.

घायल तन और मन घायल,
सहलाती अंगुलियाँ घायल,
दर्द दमन जब रूपायित कर ,
         दिखलाया ,
   धीरे-धीरे ही सही पर ,
   नदी आग ले बहती है.

कहाँ दिवस और कहाँ रात है ,
तेरे ही कहने से पता चला है ,
मुक्ति का गायन श्वासें करती ,
         समझाया ,
   धीरे-धीरे ही सही पर ,
   कुछ मशालें दहती हैं .



Monday, 17 September 2012

कुछ तो बोलो , चुप क्यों रहते ?

कुछ तो बोलो ,
चुप क्यों रहते ?
चलने पर पैरों के
नीचे आती जैसे ,
चरमर-चरमर ,
रेत बोलती ,
वैसे बोलो तो
कुछ मैं पावन जानूं .

आँखों में अश्रु ,
लिए हुए तुम ,
दबे जा रहे ,
पीडाओं का
लिये पहाड़ ,
चुपके-चुपके ,
जोर लगा कर
बाहर आना ,
जैसे धरती में
दबे बीज का ,
अंकुवा बन कर ,
बाहर आना.
तुम भी
बाहर आओ तो
कुछ मैं पावन जानूं .

वो आते हैं ,
अभिनेता से ,
अभिनय करते ,
अपने बनते.
कुछ विश्वास,
और -
दिलासा देकर ,
तेरी झोली में ,
हाथ डाल कर ,
जो भी मिलता ,
ले कर वो तो ,
चलते बनते.
तू है कि बस ,
लुट जाने का ,
रोना रोता ,
पता नहीं क्यों ,
रक्त तेरा है ,
इतना शीतल ,
चूल्हे पर चढ़ी ,
दुग्ध-भगोनी ,
जैसे उफने तो ,
कुछ मैं पावन जानूं.