Saturday, 31 December 2011


अब नहीं गोपन है , स्वामी ! सब सामने है,
                       राम - दूत हनुमान , कहा आप मानिए .
अपहृत जानकी को , राम-हस्त सौंप कर 
                       क्षमा मांगें आप अब , सत्य राह मानिए . 
भूल-चूक होती ही है , समय पे सुधार लें , 
                       भूल को स्वीकार करे , भद्र जन मानिए .
अद्य सत्य राम रूपि , सत्य को स्वीकार कर,
                       काल-जयी बन जाएँ , राम प्रभु मानिए .
                        
कही गयी स्वामी सब , गरल सम उक्तियाँ ,
                        रुजता में गरल ही , सुधा सम बनता .
ध्यान नहीं देने पर , रुजता विषम होती ,
                        रुजग्रस्त तन-मन , भार सम रहता.
पथ्य लिया जाए तब , रुज कट-छंट जाता ,
                        रुज को दबाने पर , काल सम बनता .
महारुज  अहंकार  ,आत्ममुग्ध करता है ,
                        हे लंकेश मुग्ध जन,अंध सम बनता .
                         
ऐसा नहीं स्वामी अत्र , हों ही नहीं बुद्धिजीवी  , 
                        पर यहाँ भयभीत , कुछ नहीं कहते.
बुद्धिजीवी कहते तो , सत्य नहिं कहते हैं ,
                        सत्य यदि कहते हैं ,पूर्ण नहीं कहते.
पूर्ण सत्य कहते तो , तंत्र कोप भोगते हैं ,
                        तंत्र तले अभिव्यक्ति,मुक्त नहीं करते.
प्रतिफल स्वेच्छाचारी , मूल्य भ्रष्ट करते हैं ,
                         हरण जैसे कृत्य में , चूक नहीं करते .
                                                             
                                               

Friday, 30 December 2011

जनक सभा के मध्य , हिला ही नहीं पिनाक ,
                      लज्जित हुवे  थे  अति , तत्र  अहंकार से .
यमी साक्ष्य लिए हुवे , सहस्त्रबाहु द्वंद्व के ,
                     आप वहाँ बच गए , सुमाली  सौभाग्य से .
कौतुक में ही बालि ने ,चाँप लिया भुज तले,
                     छोड़ दिया विप्र मान , पुलस्त्य प्रभाव से .
स्वामी ! भवत् विरद से , पूर्व से ही भिज्ञ हूँ मैं ,
                     प्रीति हो तो और कहूँ ? आप के आदेश से .

विचलित दशग्रीव  , इंगित कर तर्जनी ,
                      कहता  है वानर से ,कपि कटुभाषी है.
कई-कई रण कर , देव-नर-नाग जीते ,
                      पर  तुझे दृष्ट  नहीं , अति  बकवादी  है.
अनुभूत सत्य यह , सुकृति है रक्ष-राज   ,
                      अंध नेत्र सुहाये ना ,अति ही विरोधी है. 
जिसे चाहा खुद या , नहिं या जीत लिया,
                      मेरा कहा कौन टाले? रावण यशस्वी है.


स्वयं का विरद गान , तुच्छ जन करते हैं,
                      अन्य जन यश कहें , सम्मान  वो  मानिए.
व्यक्तिनिष्ठ हो कर के, लोक का दमन कर ,
                      तुच्छ  काम साधते हैं , कुराज  वो  मानिए.
शोषण-दमन कर , हरण-दलन कर ,
                      तन्त्र चाहे कैसा भी हो ,ध्वस्त ही वो मानिए.
स्वामी यह अहंकार , पंक सम  लीलता है ,
                      प्रभु-द्रोही संस्कृति को ,कुत्सा ही वो मानिए .                      

Tuesday, 27 December 2011

कपि श्री विनम्र बन , कहते दशग्रीव से ,
                        स्वामी ! मैं हूँ शाखामृग , शुद्ध वनवासी हूँ.
चतुष्पद भूत मात्र , भ्रमण स्वभाव मम ,
                        आगत  स्वभाव वश  , पक्ष  से  प्रवासी  हूँ .
पत्र  - पुष्प मैं चर्वित , प्रताड़ित राक्षसों से ,
                        आत्म-रक्षार्थ रक्ष हत , मैं निरपराधी  हूँ .
राजा मानूं  राम मात्र , शेष सब दास मात्र ,
                         प्राण-सूत्र  राम-हस्त , पूर्ण मैं  विश्वासी हूँ .     

दशानन कहता है ,वानर तू अपराधी , 
                          अति  अपराध  कर  ,  हमें  धमकाता है .
अशोक को उजाड़ के , सुपाट दिया शव से ,
                           राज-रक्त से सना तू ,आँखें दिखलाता है .
लंका और रावण से , कौन परिचित नहीं ?
                           मेरे  गृह  में  मुझ  को , दास बतलाता है.
सिंहासन से उतर  , विचलित दशग्रीव ,
                           लगता  है  जैसे फणि , फुत्कार  करता है.

कपि दृढ हो के  कहे , स्वामी अब सुनिये ,
                           अपराधी मुझे कहें , स्वयं को ही मानिए .
बिना अधिकार के ही , सीता हर लाये आप ,
                           मूल्य हीन  काज में , कुहर्ता  ही मानिए .
देव नर नाग सब , लूट -लूट कर बैठे ,
                           कुत्सित कार्य के लिए , तस्कर ही मानिए .
क्रोध-हिंसा-अहंकार , वशीभूत  मन के हो,
                           मार दिए मूल्य  सारे , दास तो ही मानिए.
                                  

Monday, 26 December 2011

कपि श्री को प्रस्तुत कर , इन्द्रजीत बोलता है,
               प्रभु ! यह वानर  वो , जिसने  हिलाया  है .
अगणित रक्ष - भट्ट , आयुध अमोघ चले ,              
               इन्द्रजीत वीर को भी , छकाया-नचाया है .
वानर सम वानर , पर वानर ये नहीं .
              यह  कोई  सुदेव  है , शक्ति  को  पचाया  है.
अप्रतिम वीर यह ,ब्रह्म-शक्ति सह गया,
              आप जाने कौन यह ? स्वधर्म  निभाया है.

वाह - वाह  इन्द्रजीत  , आप अनुपम वीर ,
                        हमें बताया वानर , कैसा हृष्ट-पुष्ट है.
दर्शन में सरल है , अनुभूति ठीक नहीं ,
                        अतीव उत्पात  रचे , गुरुत्तर दुष्ट  है.
अक्षय कुमार क्षय , हुआ इसके कर से ,
                        अब नहीं बच पाये , दैव अद्य रुष्ट है . 
जाओ-जाओ वीर आप, श्रम- परिहार करो
                        इसको मैं देखता हूँ , लंकेश संतुष्ट है.

रक्त नेत्र लिये हुए , दशग्रीव बोलता है,
                       अरे ! कपि कौन तुम, लंका में हो कब से?
किस की है अनुमति , लंका में प्रवेश हेतु ,
                       इतना उत्पात किया , कौन से मंतव्य से ?
वन को उजाड़ कर ,कई सारे रक्ष मारे ,
                       अक्षय  कुमार  मारे ,  किस  अपराध  से  ?
राज दशानन अत्र , रक्ष -संस्कृति है अत्र ,
                       निश्चित  मारे जाओगे , किया जो विरोध है.
          

Sunday, 25 December 2011

विटप समूल तान , वर्तुल भ्रमण कर  ,
               दैत्य सारे लक्ष्य कर , दल  चपेट  लिया .
भुज द्वय खोल कर , रक्ष भींच - भींच कर ,
               मर्दन - कर्तन कर , वहीँ  निचोड़ दिया .
जातुधान चीखते हैं, कहाँ गये इन्द्रजीत ?
               हाय !हमें तोड़ दिया , अरे ! मरोड़ दिया.
मेघनाथ ध्यान कर , ब्रह्म - सर साध कर ,
               लक्ष्य कर वानर पे , तत्क्षण छोड़ दिया. 

देख कर  ब्रह्म - सर , कपि तत्र  चिंतते हैं ,
               कर दिया रोधन तो , ब्रह्म - अपमान है.
मानकर हरि- इच्छा, शक्ति को स्वीकार करूँ ,
                ब्रह्म-हरि -हर का ही , इसमें सम्मान है.
लक्ष्य भ्रष्ट होने पर , शक्ति रुकती ही नहीं ,
                जन-धन हानि होगी , पूर्व के प्रमाण है.
ब्रह्म-शक्ति माता आप , भवदीय सुपुत्र हूँ ,
                 कार्य सिद्धि आपसे ही , मम अनुमान है.
                     
स्फुलिंग उडाती शक्ति , आ लगी हृदय पर  ,
                 मानो स्वर्ण सुमेखला , मिली स्वर्ण श्रृंग से. 
लुंठित पवन-पुत्र , धरा पर फैल गये,
                 हाय ! शिशु सोया मानो , जननी के वक्ष पे .
राक्षसों  ने बंध बांधे , मूर्छित आंजनेय के,
                  सूम ज्यों सचेष्ट  होता ,  हाथ लगे  धन पे .
श्रम-कण छिटकता , इन्द्रजीत बैठ गया,
                  मिली  मुक्ति  मानो उसे , क्रूर काल  यम से .
               


देखा कपि श्री ने वहाँ , दुर्धर  सुभट आया,
                    दिवस में लिया मानो,अवतार तम ने .
श्याह-देह वक्र-मुख , घन सी गंभीर काया , 
                   मेघनाथ लगता था , रूप लिया घन ने ,
वज्रांग  हुंकार करे , गंभीर गर्जन करे ,
                   दैत्य के समक्ष मानो , रोष किया यम ने.
कुछ मरे  कुछ भागे , मेघनाथ चिन्तता है ,
                   वानर सा वानर या ,  कपि  रूप  हर  है.
                     
वीर द्वय भिड़ गये , रण होता कौशल से ,
                  ठेल - ठेल भिड़ते हैं , भिडंत दिखाते हैं .
मध्य में आते -जाते , अन्य रक्ष मारे जाते,
                  दाँव मार - मार कर , लड़ंत  बनाते  हैं .
अस्त्र-शस्त्र साध कर , घात-प्रतिघात कर ,
                  पूर्ण प्राण साधकर , सुखंभ टिकाते हैं.
श्रृंग चूर -चूर होते , धूलि-घन मंडराते ,
                  आग्नेयास्त्र चलते हैं , सुअंत रचाते हैं .

थाप मारी कपि ने , अचेत हो इन्द्रजीत ,  
                  लोट गया धरा पर , मानो कटा वृक्ष हो  .
शीघ्र ही सचेत हो के , बढ़ता है कपि ओर ,
                  कपि वृक्ष पर चढ़े , मानो यही  फल हो.
सुघात लगाते हुए , शाखा-शाखा कूदते हैं ,
                  चढ़ जाते दैत्य मार , मानो यही कर्म हो .
इन्द्रजीत विवश हो , कर गहे ब्रह्म - सर,  
                  मानो कपि साधने का , शेष यही पंथ हो .
                   




                    

Wednesday, 21 December 2011

चिंता- मग्न दशग्रीव , पूछता है पार्षदों से ,
            कैसे अवरुद्ध होगा , लंका में  प्रमाद जो ?
सभासद मध्य बैठा ,कनिष्ठ तनय बोला ,
            तात आज्ञा मिल जाये ,रोक दूं विवाद को.
लंकेश बोला तत्क्षणआपको उचित होगा  ,
            यथा शीघ्र रुद्ध करो , कपि के उन्माद को .
अक्षय कुमार चला , सुभट को साथ लिये ,
             निमंत्रित कर बैठा , हाय रे ! वो काल को .

अक्षय कुमार गया , जहाँ हनुमान थे ,
            देख कर  शाखामृग ,  करता प्रहार है.
भ्रष्ट  कर प्रहार को , आंजनेय हूँकते हैं ,
            दैत्य - सैन्य मार दिये, मुष्टिका प्रहार से .
रावण तनय श्लथ , होकर के चिन्तता है,
            भोला हूँ विजया खाली ,बिना ही विचार से.
तभी उसके वक्ष पे , कपि ने आघात किया ,
            मृत्यु-मुख में गया वो , अल्प ही प्रयास से.

अक्षय कुमार क्षय, जान कर दशग्रीव ,
           मेघनाथ  कह भेजा , स्थिति  संभालिए .
लंका में उत्पात करे,शासन को भ्रष्ट करे ,
           यह कौन वानर है  ? जरा   पहचानिए .
सुभटों को साथ कर , अस्त्र-शस्त्र सज्जित हो ,
           जैसे भी हो ले ही आओ , वानर दिखाइए .
सीधी अंगुली से कभी , घृत हाथ आये नहीं ,
           अंगुली को वक्र  कर , कार्य  साध जाइए .            
            

Tuesday, 20 December 2011

वनपाल मिल कर , संगठित  हुए सभी ,
                 सब मिल वानर को , वन से  हटाते हैं  .
कपि श्री वहाँ किसी से  , बांधे नहिं बंधते हैं ,
                 दैत्य धूलि चाटते हैं , कुछ मारे जाते हैं .
क्षण भर में ही वन ,  क्रंदन से भर गया,
                 कुछ  सिर धुनते हैं , कुछ भागे जाते हैं.
लंकेश सम्मुख कहे , स्वामी क्षमा कीजिए ,
                 मीचु सम कपि आया ,रक्ष फाड़े जाते हैं .    

वृत्तांत श्रवण कर  , दशग्रीव चिंतातुर ,
                 भेजता है निशाचर ,सुभट व मल्ल को .
दैत्य देख कपि श्री को , उपहास उड़ाते हैं ,
                 अरे यह तुच्छ जीव , उचित चर्वण को. 
कोई कहे रज्जु लाओ ,  ले चलो सुबंधन में,
                 स्वर्णिम गात इसकी , उचित रंजन को.  
कपि क्रुद्ध  होते हुए ,  विटप से कूदते हैं ,
                  ठोर - ठोर हूंकते  हैं ,पीसते  रदन  को .
                 
जातुधान सैन्य दल, छिन्न-भिन्न होकर के,
                   कहता लंकेश से है ,  रक्ष  मारे गये हैं.
शाखामृग गुरुत्तर , निर्भय है बलशाली ,
                   बंधन नहीं लगते हैं, रक्ष  काटे गये हैं.
विद्युत वेग धावता , यकायक दृष्ट होता ,
                   भीमकाय रूप लेता, रक्ष  रोंदे गये हैं.
पद-तले चाँप कर , कई वीर खींच दिये ,
                   हाय !दो-दो अंश कर , रक्ष फेंके गये हैं.

Sunday, 18 December 2011

माता ! जग मंच सम , हम सब पात्र हैं ,
                   नाट्य व्यवहार  सम , खेलना ही होता है.
अब मुझे जाना होगा , सन्देश लेजाना  होगा ,
                    राज - कार्य रीती यह , करना ही होता है .
क्षुधा और प्यास से मैं , बहुत ही व्याकुल हूँ ,
                     उदर को उसका कर , चुकाना ही होता है.
आज्ञा हो तो माता अब , फल-फूल भोग लूँ ,
                     गुरु-जन की आज्ञा को , पालना ही होता है.
                       
सुमुखी विहंस कर , कहती है कपि श्री से, 
                     ओह ! वत्स आंजनेय,सुख से आहार लो.
समृद्ध अशोक वन  , बहुत ही कुटिल है ,
                     तृप्ति हेतु कौशल से , करना विहार को .
ममतामयी  आभारी,सुवत्स हूँ आज्ञाकारी ,
                      शीघ्र दूर करता हूँ , क्षुधा के विकार को .
कहते ही शाखामृग , चढ़ गये वृक्ष पर ,
                       मानो शशि-आकर्षण,खींचता है ज्वार को.

विटप से विटप को , आंजनेय कूदते हैं ,
                       गहरी हुंकार कर , शाख - शाख धावते.
कूर्दन - धावन कर , वन को झकझोरते ,
                        पत्र-पुष्प -फल  से ही , अवनी को पाटते .
भ्रष्ट हुई  शाखाएं जो ,  क्षपा सम चीखती हैं  ,
                         वनपाल  दैत्य  सब , भय  मारे  ताकते .
देखो-देखो कैसा कपि , निर्भय व्यवहार में ,
                          वन  को उजाड़ता  है , कह - कह भागते.
                                                 

Wednesday, 14 December 2011

ओह माँ  !  वात्सल्य युक्ता ,  उचित कथन  तव ,
                   होते होंगे वे मायावी, हम सिद्धि युक्त हैं.
देखो यह  महाकाय , वत्स अब  तुम्हारा है ,
                    वे सुभट- बलि होंगे , हम बुद्धि युक्त हैं .
कहते ही हनुमान , भूधर से हो गये.
                     उल्लसित सीता कहे , आप युक्ति युक्त हैं.
अब कोई शंक नहीं , अब कोई द्वैत नहीं ,
                      मुक्ति मेरी निश्चित है , राम शक्ति युक्त है 

 कंकण प्रदान कर , कहने लगी जानकी,
                  वत्स स्वामी से कहना , सीता मरी जाती है.
जैसे कर सिक्ता धरी , धीरे से खिसकती है ,
                  वैसी ही है प्राण - दशा , अब  श्वाँस  जाती है.
अब न विलम्ब करो , तन जर्जर हुआ ,
                   पक्ष  सब  विलग  हैं ,  हंसी  उड़ी  जाती  है . 
आशा के ही बल पर , प्रतिदिन लड़ती हूँ ,
                   निगोड़ी ये मृत्यु मुझे , खींचे चली जाती है. 

शाखामृग हाथ जोड़ , कहते हैं जानकी से ,
                    जननी विचार यही , रखना  उचित है .
तप में ही तपा हुआ , कुंदन निखरता है,
                    कुंदन को वह्नि-दाह , सहना उचित है.
शुद्ध स्वर्ण  मोल चढ़े , स्वर्णकार हाथ चढ़े ,
                    अलंकार  उसका  ही , गढ़ना उचित है .
सीता की नियति राम ,राम की नियति सीता,
                    प्रकृति - पुरुष रूप , मानना  उचित है.

Tuesday, 13 December 2011

सुनते ही कपि श्री को ,जानकी विलाप करे,
                हे ! राघव  जानती हूँ , दुखी  कर  आई हूँ.
मेरे पीछे देवर हैं , यह तो संतोष है .
                उनके वात्सल्य को भी,छीन कर आई हूँ .
लौटूं तो भी कैसे लौटूं ? मध्य में यह वारिधि ,                 
                भाग्य  अपने  कर  से  , फोड़ कर आई हूँ  
शायद ही आहार को ,  लेते होंगे समय से ,
                हाय रे !व्यवस्था सारी ,तोड़ कर आई  हूँ.

जानकी विलाप सुन , कपि- नेत्र  भर कहे ,
                शांत रहो माता अब , क्लेश नहीं कीजिए.
प्रभु और लक्ष्मण की , सेवा में सुग्रीव दल ,
                 परिचर्या सुन्दर  है , खेद  नहीं  कीजिए  .
मुद्रिका को धार कर , राम हेतु सहिजानी ,                 
                  मुझको प्रदान करें , भ्रम नहीं कीजिए .
मर्यादा के  बन्ध लगे , न तु लेके चला जाऊं ,
                  दशग्रीव मत्सर सम , शंक नहीं कीजिए.

अरे वत्स !अति भोले , तुम अति कोमल हो ,
                   दशग्रीव  अति  दुष्ट , सुभट से युक्त है.
कई क्रूर मल्ल यहाँ , महाकाय -विकराल ,
                   ऋक्ष - वानर सरल , लघुता से युक्त है
देव - नर- नाग सब  , दमित हैं राक्षसों से ,         
                    कोई नहीं सहाय्य है ,बंधन से युक्त है 
कैसे पार पाओगे , यहाँ रक्ष छलि - बलि ,
                    तिस पर मायावी हैं,साधन से युक्त है.                

Sunday, 11 December 2011

क्षमा करें कपि वर, लंक-देश नृप भ्रष्ट ,
                  तैसा ही है जन-वृन्द ,  संदेह सहज है .
माया की प्रतिष्ठा यहाँ , असत्य ही सर्वत्र है ,
                  साधु पर प्रश्न चिह्न , लगाना सहज है. 
पग-पग मूल्य-क्षय , मर्यादा है तार-तार ,
                   सर पर भय-भाव , चढ़ना सहज है.
ऐसे वायु-मंडल में , श्वांस लेना दुर्भर है,
                   राम के वियोग में तो ,मरना सहज है.




खिन्न ना हो महतारी, तव वत्स उपस्थित ,
                  अविलम्ब लौटता हूँ, स्वामी शीघ्र आयेंगे. 
मूल्यों की प्रतिष्ठा हेतु ,त्रासदी के  अंत हेतु ,  
                   देवी  तव  मान  हेतु  , प्रभु  अत्र  आयेंगे .
धर्म-प्रति ग्लानि को , समूल नष्ट करने हेतु ,
                   शुचि  ध्वज आरोहण ,  भव - धन  आयेंगे .
दशग्रीव रोंद कर  , भव कर थाम कर  , 
                   बनने संयोगी  हेतु  ,  तव  प्रिय  आयेंगे. 

कपि राज वचन तव , मम हित अनुकूल ,
            मरू-भू में मिला मानो,शुचि जल श्रोत हो.                 
अतीव सुखद हुआ , राम का विश्वस्त यहाँ ,
            निर्धन को मिला मानो, अर्थ युक्त कोष हो.
मूल्य की प्रतिष्ठा हेतु , प्रिय अत्र आयेंगे,
            वत्स तव कथन तु , पूर्व का उद्घोष  हो.
रोंदा जाए दशग्रीव ,  राम को उचित होगा ,
            प्रिय कैसे रहते हैं , कहो तो संतोष हो .
                  
महतारी कैसे कहूँ ? राम के व्यवहार को ,
              वियोगी बन रहते, आप के अभाव में.
दिवस प्रारम्भ से वो , खोजते हैं जहाँ-तहाँ ,
              नाम ले पुकारते हैं, आप के प्रभाव में .
रजनी व्यतीत होती, अनुज सह चर्चा में ,
              हर चर्चा रंगी होती, आप के सुभाव में .
पथिक से पूछते हैं , खेचर से पूछते हैं,
              शून्य में ही ताकते हैं,राम के स्वभाव में .
                             
               



Thursday, 8 December 2011


राम चरणानुरागी , त्रिजटा यों कहती है,
                     खुद को संभाल बेटी , काहे खिन्न होती हो. 
आप से विलग हो के, राम भी वियोगी होंगे ,
                      एक प्राण होकर भी , काहे भिन्न होती हो.
माता कह बुलाती हो , तिस पर रुलाती हो ,
                       मेरी वय भी तेरी हो , काहे छिन्न होती हो.
किंचित विश्राम ले लो, अल्पाहार ले आती हूँ ,
                       राम है हरि-स्वरूप , काहे चिन्त्य होती हो

मंद-मंद वायु बहे, द्विज साम छंद पढ़े.
              सती सीता कहती है ,हाय ! मैं अकेली हूँ. 
एक-एक क्षण मुझे , संवत्सर सा लगता,
              नीरवता  कचोटती , पीड़ा की  सहेली हूँ .
कपि  क्षण वर जान ,  मुद्रिका को डालते,
              देख मुद्रा सती चीखी ,प्रिय !मैं अहेली हूँ .
कौन-कौन यहाँ कौन ,राम- मुद्रा कौन लाया ,
               सत्य यह या माया है ?हाय!मैं पहेली हूँ.

श्रद्धा-सह सम्मुख हो, तत क्षण हनुमान ,
               विनीत भाव से कहे , अम्ब !तव दास हूँ .
मुद्रा का वहन कर ,राम से ही प्रेषित हूँ ,
               आप को ही शोधता , आपके ही पास  हूँ
तव नायक रत हैं , सत्य की प्रतिष्ठा हेतु , 
               राम के उद्देश्य हेतु , कार्य का विकास हूँ .
मायावी नहीं  मानिए , आंजनेय शाखामृग,
                राम-भक्त हनुमान , राम का विश्वास हूँ.

Monday, 5 December 2011

    
सेविकाएँ  मिल कर , विकट रूप धार लो,   
                      राम-प्रिया सो ना सके , हतबुद्धि चीखता है.
राज-वामा मानकर , मैने इसे मान दिया,
                     ठुकरा दिया  मान को , मंदबुद्धि चीखता है.
प्राण इसको प्रिय तो, कर मेरा थाम ही ले, 
                     न मानती लंकेश को , पापबुद्धि चीखता है.  
 खड्ग मेरी व्याकुल है,  रक्त पान चाहती है,
                     नर नहीं नारी सही , हठबुद्धि  चीखता है.
                        


राम-राम बोल कर , प्रिय-गुण गान कर ,
                कोसकर  स्व दैव को ,सीता   विलाप करे.
दशानन  को रोक के , मंदोदरी उसे ले के ,
               "अबला है"  कह  कर , शीघ्र प्रस्थान  करे.
निशाचरी तंत्र वहाँ , सुसक्रिय हो जाता है,
                  भयकारी  रूप  ले के , मन  उद्भ्रांत  करे.
हरि-भक्त त्रिजटा जो , सीता को संभालती है ,
                  रोकती है निशाचारी , सच का उद्घोष करे.


सुनो-सुनो सब सुनो,रावण के दिन चार ,
                          अघ-घट पूर्ण हुआ ,फटने ही वाला है.
निपट है अहंकारी , दृष्टिहीन तिस पर ,
                          पर दारा हर लाया , हटने ही वाला है.
कपि एक आयेगा ही , उधम मचायेगा ही,
                          लंक - देश उससे ही,जलने ही वाला है.
वारिधि बांधा जाएगा , राघव  बल आयेगा 
                           दशकंठ  रण  में जो ,मरने ही वाला है.
                                   
हाथ जोड़ त्रिजटा से , सती सीता बोलती है ,
                      त्रास  मेरा कट जाए ,  माता कुछ कीजिए .
प्राण कैसे धारूं अब , प्राणाधार मिले नहीं ,
                      प्राणाधार मिल जाए , ऐसा  कुछ कीजिए.
राम सुध लेते नहीं , प्रिय बिना व्यर्थ सब,  
                      प्राण  छूट जाए  अब , यत्न  कुछ  कीजिए .
मम राम विमुख होंगे, ऐसा नहीं लगता है,
                      वे भी अति खिन्न होंगे , राह कुछ कीजिए.                 
मध्य  दुर्वा खड़ी कर  , सीता बोली चुप शठ ,
              देख आज  दुर्वा साक्षी , संवाद जरूरी है.
सिंहासन साकेत का है, शेष  सब पट्ट मात्र ,
              मैं तो रानी राम की जो , निर्वाह जरूरी है.
भूत मेरे राम  रहे , वर्तमान राजा राम,
               भविष्य भी राम होंगे , विचार जरूरी है. 
देव-नर-नाग सब , नियति में बंधे हुए ,
               पर  आततायी  तेरा  ,  संहार  जरूरी  है 
                
रावण अधीर हो के , भाल पर बल दे के
                बार - बार खड्ग खींचे , भय भर जाता है.
वानर सचेत हो के ,  अंग सब समेट के ,
                दन्तावली भींचता है , क्रोध भर जाता है.
 मंदोदरी आगे आ के , दशानन को रोक के ,
                 सुनीति सिखाती है वो ,क्षोभ भर जाता है.
जानकी विलाप कर  , राम गुण-गान कर ,
                  स्वप्रीति को बताती है , कंठ भर जाता है.

सीता मात्र राम की है, राम मात्र सीता के हैं ,
                    सीता के हृदय पर , राम-माल शोभती .
नहीं रुचे कंठहार, मणि-माल पुष्प-माल
                    राम-भुज मेरी माल,वो ही माल शोभती.
वैभव मात्र राम का , और सब  दीन-हीन
                     मर्यादा में बंधी माल , वह माल शोभती.
रोमावली राम बसे, प्राणावली राम कहे
                     राम को ही समर्पित, प्राण-माल शोभती.

                              

Friday, 2 December 2011

सुदूर से आता हुआ , घर्र-घर्र नाद उठा ,

सुदूर से आता हुआ , घर्र-घर्र नाद उठा ,
              देखा आंजनेय ने , सैन्य - दल आता  है.
अग्र भाग गज-दल  , पश्च भाग अश्व - दल ,
              मध्य भाग भव्य-रथ , वेग सह आता है.
मृग एक दौड़ कर , दुखिया के अंक सटा ,
              शिशु मानो मातृ-अंक ,चढ़ा चला आता है.
 भय मारे भागते हैं, भोले - भाले वन्य जीव ,
              छिपते हैं जीव मानो ,ध्वंस चला आता है
             
सैन्य दल फैल गया , चक्राकार रचना में ,
                भव्य रथ रुक गया , दशग्रीव आया है.
ले के साथ नारियों को , आगे कर मंदोदरी ,
                छैला - रूप धर कर , हतबुद्धि आया है.
बुद्धिमंत हनुमान , शीघ्र ही समझ गये ,
                जानकी से मिलने को,मंदबुद्धि आया है.
सती सीता मुंह फेर , करुण विलाप करे ,
                 हाय ! राम शीघ्र करो , शठबुद्धि आया है.
                
हुआ सम्मुख लंकेश , सती से यूँ कहता है ,   
                  मुझ को स्वीकार करो , रक्ष-रानी  बन जा.
मेरे साथ पार्श्व-बैठ , सिंहासन कृतार्थ करो , 
                  वैभव तुम्हारा  होगा , राज-रानी बन जा .
भूत अब भूल जाओ , वर्तमान सम्मुख है,
                   भविष्य भी यही तय , भव-रानी बन जा.
देव-नर-नाग सब , हैं मेरे यहाँ तत्पर ,
                   सबको आदेश देना , पट-रानी बन जा.
         
        

Thursday, 1 December 2011

देखते हैं तत्र कपि , कुछ भिन्न भाग एक,
                   निर्मल आलोक वहाँ , सब कुछ शांत है.
विरुद्ध स्वभाव भूत , चर रहें साथ-साथ,
                    सिंह-अजा मित्र सम , द्वेष यत्र सांत है.
श्येन- व्याल साथ रह , अहिंसा भाव रचते ,
                    द्विज वहाँ उल्लसित,कोई नहीं क्लांत है.
सुधा सम नीर बहे, शीतल समीर बहे ,
                    विनीत हैं पञ्च-तत्त्व , कौन कहाँ भ्रांत है.


राम -चर वहाँ गये , अद्वितीय आकर्षण  ,                  
                      मंद-मंद वायु बहे , क्षीण जल-धार है .
शाख-शाख झूमती है , पत्र करे झरमर ,
                     रवि किरणे नाचतीं , सघन  गुंजार है .
सरल सरस ध्वनि , श्रुति को संपन्न करे,
                     तत क्षण आये शत, मन में विचार हैं.
ओह ! राम रमापति , निर्जन इस प्रांत में,
                     राम-राम मन्त्र गूंजे,कैसा व्यवहार है.
                    

सुरोहित सुवृक्ष से , आंजनेय देखते हैं ,
                   सुमुखी - सुमंगला वो , आम्र तले है रोती . 
अति क्षीण तन हुआ, शिथिल है गात्र  हुआ ,
                   बल - हीन वाणी ले के , राम को पुकारती.
भुज द्वय घुटनों पे , सर धर लपेटती  ,
                   जीर्ण हुई साडी खींच,खुद को वो ढांकती.
सज्जा हीन वेणी एक , प्रसरित भाल -बिंदु ,
                   घायल कपोती सम ,प्राण को वो धारती.

Wednesday, 30 November 2011

अब सुनो हनुमंत , सीता के लिए कहूँ , 
                    विभीषण बोलते हैं, पर वाणी काँपती .
दशग्रीव हर कर , सती सीता साथ लाया ,
                    मंदिर चंचल  हुए , धरा यहाँ  डोलती .
सागर भी क्रुद्ध हुआ , अति वृष्टि होने लगी,
                    अग्नि अति क्रुद्ध हुई ,जीवन को सोखती.
झंझावात के ही मध्य , अशोक वन में गया ,
                    तब से ही नभ तले ,राम-नाम  बोलती.


कहते हैं विभीषण, अशोक वन की राह ,
                   हो कर के ध्यान मग्न,सुनते हनुमान. 
पूरी राह कह कर ,  चुप  हुए संत श्रेष्ठ ,
                   रुदन  में  विभीषण  , काँपते  हनुमान.       
बलशाली जम्हाई ले, वज्रांग तन गये ,
                   लोल  हुए अंग - अंग , हांफते हनुमान.
मित्र श्री !उचित लगे , उसे ही आप कीजिये ,
                    लेकर  के  अनुमति  ,  बढ़ते  हनुमान .
   
कपि ले के सूक्ष्म रूप, उतरे भूधर पार ,
                    पहुंचे सघन वन , जो अतीव भारी है.
गगन सुभेदती है, बहु उच्च  विटपमाल,
                    पन्नग सी हरियाली,अति मनोहारी है.
कई-कई पुष्प रूप, कई-कई फल रूप ,
                     भ्रमर  गुंजार  तहाँ , बहु  रसकारी  है. 
दिवस में रजनी की  , गति जहाँ रहती है ,
                      पग-पग  निशाचर , खूब भयकारी है.


Tuesday, 29 November 2011

नित्य कर्म से निवृत्ति,शीघ्र कर विभीषण ,
                 सरोवर  तट  पर , हंस  सम दिखते .
अश्व - दश साध कर,संध्या-वंदन करते ,
                 अर्चन समय पर ,पुष्प  सम खिलते.
गुरु-गौरी पूज कर , राम-नाम भज कर ,
                 कपि-वर भेंट कर  , मित्र सम लगते.
गुणवंत हनुमान , तत्काल बोल उठे ,
                 कहो मित्र आप कैसे,दुखी सम रहते ?


भूपाल जिस देश  का  है कुत्सित-अहंकारी  ,
                   कल्पित है सुख वहाँ , सत्य है बुद्धिमंत.
है उत्कोची सभासद , कर्मचारी - अधिकारी ,
                    जीवन अशांत वहाँ , सच कहूँ गुणवंत .
स्वेच्छाचारी जन-वृन्द , भ्रष्ट-मूल्य में जिये ,
                    ऐसा राज लुप्त होगा,देखिये ज्योतिर्वंत 
आह लम्बी भर कर, बोल गये विभीषण ,
                    अग्रज  हैं दशग्रीव ,  दुख  है  हनुमंत .


अपहरण - तस्करी,लूट जहां गर्व हेतु,
                     कपि-श्रेष्ठ समझिए , तत्र मुख्य स्वार्थ है.
शोषक व अत्याचारी , पाते हैं प्रतिष्ठा जहाँ ,
                     प्रज्ञा  वहाँ  मर जाती , तत्र  तु  कदर्थ  है.
दश अश्व मुक्त कर, तन - रथ डोलता है ,
                      मार वहाँ मुख्य होता , तत्र सर्व व्यर्थ है.
सीता सती हरी जाती , नारी वस्तु मानी जाती,
                       वहाँ सुख - शांति नहीं , तत्र तु अनर्थ है.

Monday, 28 November 2011

प्राची अनुराग लिए , स्वर्ण किरणें फेंकती,
                      भाग  फटे जाग  हुई , विभीषण  जागते .
राम-राम हरे राम , हरे-हरे राम-राम,
                       कोमल सुकंठ लिए , नाम श्री अलापते.
द्विज रूप धार कर, नम्र हुए हनुमान , 
                       चकित हैं विभीषण, विस्मित विराजते .
आप कौन द्विज श्रेष्ठ , हर हैं या हरि मेरे ,
                       राम  हैं या  रमापति ? पूछ  के दुलारते.


नम्र होके बोले कपि , क्षमा करें संत श्रेष्ठ ,
                        द्विज  नहीं  वानर हूँ, यहाँ  मैं प्रवासी हूँ .
हर नहीं हरी नहीं , नहीं राम रमापति ,
                         राम - दूत हनुमान , भारत  निवासी हूँ .
सरल पुनीत आप , राक्षसों के मध्य कैसे ?
                         यही सब जानने को,अतीव जिज्ञासी हूँ. 
मेरे स्वामी राम जी हैं, सीता उनकी प्रेयसी ,
                         सीता शोध के लिए ही,पूर्ण मैं प्रयासी हूँ.


नम्र होके विभीषण , बोले हनुमान से ,
                          आप  मेरे अतिथी हैं , श्रम  परिहारिए .
नित्य कर्म निवृत्ति ले, संध्या-वंदन कर लूं ,
                          राम -नाम ले ही लूं,अल्पाहार कीजिए.
आप जिस कार्य हेतु , यहाँ तक आये हैं ,
                           संकल्पबद्ध  उसमें , सहयोगी जानिए.
धीर-बुद्धि विभीषण , यह कह बढ़ गये,
                            डूब गये चिन्तना में,ऊभ-चूभ मानिए.                  

Sunday, 27 November 2011

ऊंचे- ऊंचे सदन जो, गगन को भेदते,
                      पूर्ण देख आते मानो, कभी नहीं देखे हैं.
भांत-भांत लता कुञ्ज , सघन विटप माल .
                      पूर्ण  घूम आते मानो, कभी नहीं घूमे हैं.
भूतल में कक्ष बने, गहरे जो गह्वर थे ,
                      पूर्ण फिर आते मानो,कभी नहीं फिरे हैं.
ऐसा कोई कोना नहीं , जहाँ माँ को देखा नहीं ,
                      देखते हैं ऐसे मानो, ,कभी नहीं देखे  हैं.


मंदिर दशानन का ,भौतिकता से पूर्ण है,      
                       भित्ति-गच स्वर्ण में जो,नील मणि मुख्य  है.
वातायन-सुद्वार के , गंध के कपाट हैं,
                       सूक्ष्म  हुई  नक्काशी में , रक्त मणि मुख्य  है.
वर्तुल सोपान बने,  पन्नग से रचित जो,
                        छाजन पे  चित्रकारी , मुक्ता - मणि मुख्य  है.
कई-कई स्वर्ण -कोश , कई-कई रजत कोश,
                        अनेक  हीरक  कोश , पदम् - मणि मुख्य  है.


देख कर विलम्ब होता ,शीघ्र बढे हनुमान ,
                          सारे कक्ष छान लिए , महतारी नहीं है.
सुसज्जित शयन कक्ष , सुनिर्मल पर्यंक ले,
                          दशानन निद्रा-मग्न ,पुनिताई नहीं है.
अन्य एक मंदिर में , भद्र - जन निद्रा मग्न ,
                          हरि - हर शोभित जो , कुटलाई नहीं है.
राम दूत चिन्तते हैं  , सीता शोध कार्य हेतु ,
                          हरि- भक्त  मित्रता  में , कदराई नहीं है.               

Friday, 25 November 2011

नगर के चहुँ ओर , हलचल अतिशय ,
                    सुभट  के  दल  से है  ,रक्ष - देश  रक्षित .
गज-अश्व उष्ट्र -खर, सुरथ की सवारी है,
                     दौड़ रहीं डोलियाँ हैं , दीन यहाँ शोषित .
अति लोल ललनाएं , रुचिर श्रृंगार किये,
                     मदन संचार  करे , मार  हुआ  वन्दित.
नर सब भीम काय , भोग की ही लिप्सा में ,
                     मद्यपान  में ही रत , धर्म हुआ उपेक्षित .


हनुमान रुककर , क्षण भर सोचते हैं,
               यत्र-तत्र स्वर्ण-सज्जा,भोग की ही संस्कृति .
रक्ष-नर हिंसा रत, अहिंसा पानी भरती ,
                दया- धर्म -प्रेम नहीं , विकृति  ही  विकृति.
रक्ष- देश ललनाएं , उन्मुक्त हो के रहती,
                लाज- शर्म -त्याग नहीं,  है मकारी प्रकृति.
आतंकित  नर-वृन्द  , भयभीत  देव-वृन्द,
                दशानन  का  देश है  ,  दमन  की  आकृति.


लंक- देश में पतित , देख कर मूल्य को,
                 क्रुद्ध हुए कपि श्रेष्ठ , छूट गयी लघुता .
पूर्व रूप पाते ही , देख लिया प्रहरी ने, 
                 अस्त्र-शस्त्र ले के दौड़े,उनकी ही प्रभुता.
कपि कहाँ चुप रहे ,छीन लिए अस्त्र-शस्त्र,
                   इक्षु दंड सम चीर , बताई दी  गुरुता .
पार्श्व में प्रासाद देख ,पुनः लिया रूप लघु , 
                   वेग से प्रवेश कर ,काम ले ली दक्षता.                 

Wednesday, 23 November 2011

मार कर के फर्राटा , वीर गया उस पार .

मार कर के  फर्राटा ,  वीर गया  उस पार ,
                   भूधर  की  तलहटी , बाज सम उतरा .
तोड़  कर के सन्नाटा , कपि चढ़ा भूधर पे,
                   उच्च एक श्रृंग पर , वह्नी  सम  दहका.
मार कर के घर्राटा , दृष्टि डाली चहुँ ओर,
                   हरी-भरी प्रकृति मे ,मणि सम चमका.
दूर से आया चर्राटा , जहाँ स्वर्ण नगरी थी,
                   तमतमा  कर बढ़ा , रवि  सम  दमका . 


स्वर्ण मढ़ी लंका खड़ी ,पग-पग रत्न जड़े ,
                   आभ पड़े नगरी पे, चक्षु चुंधियाती है .
बहु पीन परकोट , खूब फैले राज पथ ,
                   फणी सम वीथियों  में, बुद्धि चकराती है  .
यत्र-तत्र ताल कूप , तडाग बाग़ नालियाँ ,
                    झरनों की झरन में , वृष्टि  मंडराती  है.
ठौर-ठौर मधुशाला , ठौर-ठौर वधशाला ,
                    देख भ्रष्ट मर्यादा को,आत्मा तलफाती है.


लेकर के सूक्ष्म रूप , नर-नारी बीच पैठ ,
                  गतिविधि  देख कपि , सुचर  से  बढ़ते.
द्वार-द्वार पहुँच के, पोल-पोल पैठ  कर ,
                   कक्ष-कक्ष छान कर, शोधक से लगते.
फिर नयी ठोर दिखे, फिर नयी आस बंधे ,
                     तत क्षण दौड़ जाते, धावक से लगते.
 मिले नहीं महतारी, आँखे भर-भर आती ,
                    वक्ष बैठ-बैठ जाता , बालक से लगते .



Tuesday, 22 November 2011

अरि कंपकंपाता है.







ब्रह्मा आये भारती ले , लक्ष्मी-पति रमा सह,
                  उमा महेश पहुँचे , पहुँचे हैं  गणेश .
सुरपति हर्ष करे, देवियाँ विरुद कहे,
                देव मुनि वृष्टि करे,पुष्प लिए  विशेष  . 
परीक्षा लेली देव ने, उतीर्ण हनुमान हैं ,
                मंद -मंद उमा हँसे , पुलकित महेश .
सुरसा कहे  जाइए , प्रभु जी काज साधिए,  
               हृदय में संजोइये ,  रघुकुल नरेश .


सागर के मध्य रह , चेटक करे लंकिनी ,
                नभचर मुग्धकर, पकड़ के खाए है.
मथ डाले पक्ष उनके, कंठ को मरोड़ डाले,
                अंग सब चट कर , रक्त से नहाए है.
पूर्व से ही हनुमान , सावधान हो गए,
               चेटक चला ही नहीं,थाप खाए जाए है. 
देखा वर वीर ने भी , काज में  विलम्ब  होए ,
                मुष्टिका प्रहार कर , लंकिनी सुलाए है.